नगरसेठ लक्ष्मीचंद्र ने व्यापार से अपार धन कमाया, अनेक भूमियों, भवनों-अट्टालिकाओं के स्वामी बने। स्वभाव से सीधे व प्रकृति से धार्मिक तो थे परंतु वणिकपुत्र होने के कारण अपनी स्वाभाविक वणिकवृत्ति से विवश होकर मिलावट करने, कम तौलने आदि से परहेज न करते थे। पत्नी की असमय मृत्यु से दुःखी रहते थे अतः इकलौते पुत्र का विवाह कुछ जल्दी कर बहू घर ले आये पर दुर्भाग्यवश पुत्र भी ज्वर से पीड़ित हो चल बसा। बहू थी तो वणिकपुत्री परंतु वह आडंबरयुक्त धार्मिक सोच से विपरीत तार्किक सोच रखती थी। दुःखों से मुक्ति हेतु लक्ष्मीचंद्र किसी साधू की सलाह पर वर्ष में एक बार विशाल यज्ञ एवं भंडारा आयोजित करने लगे। बहू से व्यापार में नैतिकता एवं शुद्व आचरण करने की सलाह पाने पर लक्ष्मीचंद्र ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यदि मुझसे कोई पाप हो भी जाता है तो उसका कुफल यज्ञ-भंडारे के आयोजन से अर्जित पुण्य से निष्प्रभावी हो जाता है।
एक रोज बहू ने लक्ष्मीचंद्र को स्वल्पाहार में अन्य सामग्री के साथ-साथ दही व शहद भी दिया। लक्ष्मीचंद्र ने बहू को समझाते हुये उनका सेवन नहीं किया कि दही एवं शहद दोनों ही स्वास्थ्य के लिये तो उत्तम हैं पर इनका संयोग विषतुल्य होता है। बहू ने कहा कि स्वल्पाहार में गर्म जल एवं नींबू भी है जो विष का शमन कर देगा। बात आयी गयी हो गयी। कुछ काल पश्चात पुनः बहू ने रात्रिकालीन भोजन में उड़द की दाल के बने स्वास्थ्यवर्धक पकवान दही में फुलोकर परोसे एवं श्वसुर को बताया कि साथ में बाजरे की रोटी व पुराने नींबू का अचार भी है जो विष का शमन कर देंगे। लक्ष्मीचंद्र ने दुःखी होकर पुनः उक्त सामग्री अलग कर दी। अनेक बार पुनरावृत्ति होने पर एक दिन लक्ष्मीचंद्र ने बहू से पूछ ही लिया कि वह उत्तम व स्वास्थ्यवर्धक भोज्य सामग्री का विषोत्पादक संयोग बनाकर एवं साथ में उसका शमन भी क्यों देती है? बहू ने उत्तर दिया कि संतान माता-पिता से ही सीखती है, आप मेरे पितातुल्य हैं, मैंने यह आपसे ही सीखा है। पहले आप पाप पर पाप करते हैं एवं उसके शमन हेतु पुण्य कमाने के उद्देश्य से वर्ष में एक बार यज्ञ-भंडारा आयोजित कर देते हैं। जबकि ‘कर्म विज्ञान’ कहता है कि मनुष्य को उसके द्वारा किए गए पाप का दंड एवं पुण्य का लाभ अलग-अलग मिलता है, दोनों अलग-अलग संचित होते हैं, उनके प्रभाव भी क्रमानुसार यथासमय स्वयं को भोगना ही पड़ते हैं,। पाप कर्म को पुण्य कर्म उदासीन नहीं कर सकते न ही उनका एक दूसरे से शमन होता है। यदि आपके पापों का शमन यज्ञ-भंडारे से हो जाता तो आपकी पत्नी एवं पुत्र की असमय मृत्यु क्यों होती?
जीवन की पुस्तक के मैले पृष्ठों को धोने, निरुत्तर लक्ष्मीचंद्र की आंखों से आंसू उमड़ पडे़।
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