‘‘ यार! दुष्ट कोरोना के विश्वव्यापी आक्रमण से सारा संसार त्रस्त है, पता नहीं इसका कभी अन्त होगा कि नहीं।’’
‘‘ सच कहा, बेचारे डाक्टर लोग तो उससे खूब लड़ रहे हैं पर वह हार मानने को तैयार ही नहीं, बल्कि उन्हें ही अपनी चपेट में लेता जा रहा है!’’
‘‘यार! तुम्हारे वो ‘चमत्कारी त्रिकालदर्शी गुरु’ कहाॅं गए जो नेताओं के लिए बड़ी बड़ी भविष्यवाणियां किया करते थे? उनसे कहना कि जनकल्याण के लिए कुछ चमत्कार कर दिखाओ।’’
‘‘ पता नहीं, आजकल दिखते ही नहीं हैं, लाकडाउन है न। वे तो क्या बड़े बड़े प्रवचनकर्ता और तथाकथित भगवानों के एजेंट भी भगवानोें के घरों में ताला लगा कर भूमिगत हो गए हैं। सचमुच इस दुष्ट कोरोना ने सबको परास्त कर दिया है, शायद इसका कोई इलाज ही नहीं है।’’
‘‘ दुष्टों से निबटने के लिए हजारों साल पहले ‘‘चाणक्य’’ ने दो उपाय बताये थे, मेरे विचार से वही करगर हो सकते हैं, पर दुख है कोई उनका उपयोग ही नहीं करना चाहता।’’
‘‘वे उपाय क्या हैं?’’
‘‘खलानां कंटकानाम् च द्विविधैव प्रतिक्रिया, उपमान्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्। अर्थात् दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं, पहला जूतों से उनका मुंह तोड़ देना और दूसरा उनसे दूरी बनाए रखना। पहला उपाय तो प्रयुक्त नहीं हो सकता क्योंकि कोरोना का मुंह तोड़ने के लिए जूता (अर्थात् दवा या वैक्सीन) अभी नहीं बन पाया है, इसलिए वर्तमान में उससे ‘दूरी बनाए रखने’ वाला दूसरा उपाय ही सुरक्षा दे सकता है।’’
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