‘‘ चलो अच्छा हुआ, सरकार ने बच्चों के बस्ते का बोझ डेड़ से पाॅंच किलो तक निर्धारित कर दिया। ’’
‘‘ हाॅं, शायद हल्का बस्ता लेकर अब वे तेज चल सकेंगे।’’
‘‘ क्या मतलब?’’
‘‘ इतने सालों में सरकार को लगने लगा था कि हम भारी बोझ उठाने वाली भीड़ को तैयार रहे हैं।’’
‘‘ आखिर तुम क्या कहना चाहते हो?’’
‘‘ यही, कि सरकारें सत्तर साल से आज तक यह पता नहीं लगा पाई हैं कि बस्तों में रखी मोटी पुस्तकें ज्ञान भी देती हैं या केवल जानकारियाॅं। परीक्षा में अधिकतम अंक लाने की दौड़ में अपने साथियों को कैसे पछाड़ा जाय बस यही सिखाना रह गया है अब तो। कुकुरमुत्तों की तरह यत्र तत्र ऊगे ट्रेनिग कालेजों से जिस प्रकार के शिक्षक निकल रहे हैं यह भी सरकारों का नया कमाल है। ’’
‘‘ यार बात तो तुम्हारी बिलकुल सही है, बार बार पाठ्यक्रम बदला जा रहा है, गाॅंव हो या शहर जगह जगह दीवारों पर कोचिंग क्लासों के विज्ञापनों की भरमार है। भारत के निर्माता, स्कूलों कालेजों में नियुक्त पूर्णकालिक शिक्षक, वहाॅं केवल समय निकालते हैं और अलग से कोचिंग क्लासों में यही दावपेंच सिखाते देखे जाते हैं।’’
‘‘ हाॅं, शायद यही कहलाता हो, मेक इन इन्डिया।’’
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