Friday, October 2, 2020

200 कुल तारक

 अपने क्षेत्र में प्रभावी बुन्देला जी को आशा के विपरीत जब लगातार तीन पुत्रियाॅं उत्पन्न हुईं तो निराशा में घिरे उन्हें लगा कि उनका वंश अब आगे नहीं बढ़ पाएगा। उनकी मनोदशा को देख उनके दूर के निस्संतान रिश्तेदार ने उनकी बड़ी पुत्री को गोद लेकर उनकी पीड़ा को कम किया पर, पुत्र की चाहत में अनेक मन्नतें, पूजा पाठ और विधिविधान का पालन करते हुए जब उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ तो उनकी प्रसन्नता आसमान छूने लगी । पूरे माह पुत्रजन्म का समारोह मनाया गया। किसी भी पुत्री के जन्म पर उन्हें प्रसन्न्ता ही नहीं हुई इसलिए उनका जन्म दिन मनाने का औचित्य ही नहीं समझा गया पर पुत्र का जन्मोत्सव प्रत्येक साल मनाया जाता । समयानुसार पुत्रियाॅं अपने पराक्रम से पढ़ लिख गईं, और भाग्य से अच्छे घरों में शादी कर सुख से अपने परिवार में रहने लगीं। इधर बुंदेला जी के सुपुत्र लाड़ प्यार में पलकर पच्चीस साल के  हुए पर बौद्धिक स्तर कमजोर रह गया इतना तक कि डाक्टरों ने कहा कि उन्हें मानसिक विकलाॅंगता है। वह छोटे बड़े हर काम में माॅं या पिता की सहायता बिना कुछ न कर पाता। उम्र के अन्तिम पड़ाव में गंभीर बीमारी से ग्रस्त बुदेला जी की पत्नी ने इच्छा व्यक्त की कि इस रक्षाबन्धन पर सभी पुत्रियों को बुलाकर त्योहार मनाया जाय। उन्होंने सभी को पत्र लिखकर आमंत्रित किया पर सभी ने किसी न किसी कारण से असमर्थता की सूचना दे दी। बड़ी पुत्री ने लिखा,

‘‘जिन्होंने मुझे पालपोस कर बड़ा किया और आत्मनिर्भर बनाया वही मेरे असली माता पिता हैं। फिर भी, यदि आपके अहंकार को ठेस न पहुंचे तो निवेदन करना चाहॅूंगी कि जिस पुत्र की चाह में आपने हम पुत्रियों को हेय समझा वह अपनी रक्षा स्वयं ही न कर सकता हो तो उससे रक्षाबंधन पर हमारी रक्षा का वचन दिये जाने का अभिनय क्यों? हाॅं, यदि वह मुझे रक्षासूत्र बाॅंधे, तो मैं अवश्य उसकी रक्षा करने का वचन और उपहार देने आ सकती हॅूं।’’




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