ज्ञानी लोग सँख्या में अधिक हो गये तब उनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्वता बढ़ने लगी। सभी अपनी अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ाने के लिये नयी नयी उपासना पद्धतियाॅं सिखाकर लोगों को रिझाने लगे और अपनी पहचान बनाने के लिये माथे पर चन्दन का विशेष आकार प्रकार का चिन्ह बनाने लगे। कोई गोल विन्दु, कोई लम्बवत एक रेखा, कोई आड़ी तीन रेखा, कोई लम्बवत यू आकार का, कोई लाल रंग, कोई सफेद, कोई पीला जाने कितने प्रकार से चिन्हाँकन होने लगा। अब तो इन आकारों के स्टेंसिल भी बाजार में मिलने लगे हैं । लोग पूजा उपासना तो जो भी करते हों पर इस चिन्हाॅंकन में अधिक समय लगाकर आकर्षक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कुछ व्यावसायिक पंडित तो अपने इस चन्दन के रंगबिरंगे चिन्ह को सजाने के काम को ही पूजा कहते हैं ।
हमारे यहाॅं के एक विद्वान व्याकरणाचार्य, संस्कृत पाठशाला में शिक्षक और धर्म के मर्मज्ञ पंडित जीवनलाल अग्निहोत्री इस चिन्हाॅंकन से चिढ़ते थे, इसलिये उन्होंने अपने माथे पर उन सभी प्रतीक चिन्हों को एक के ऊपर एक चिन्हित कर अपनी पहचान बनाने की पद्धति अपनाई । इस प्रकार उनके मस्तक पर कोई आड़ी, कोई तिरछी, कोई खड़ी और कोई वक्राकार रेखाओं के विचित्र चिन्ह बन जाते और वे शान से सभाओं में जाते, व्याख्यान देते, प्रवचन करते और वाहवाही लूटते। कुछ श्रोतालोग तो सब कुछ भूलकर उनके मस्तक की ओर देखते हुए इस चन्दन की आकृति पर ही सोचते रहते।
एक बार विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आयोजित की गयी संगोष्ठी में अग्निहोत्री जी को बुलाया गया। कार्यक्रम में अनेक विद्वान, प्रोफेसर, शोधकर्ता अपनी अपनी बात कहते और प्रशंसा पाते। अग्निहोत्री जी के बोलने का क्रम आया तो एकत्रित हुए प्रोफेसरों ने उनकी साधारण वेषभूषा और खिचड़ीनुमा चन्दन की आकृति देख उपहास करने का मन बनाया।
एक ने पूछा, ‘‘आपको कितनी तनख्वाह मिलती है?’’ वे बोले ‘‘अठारह सौ।’’ तत्काल दूसरे ने कहा ‘‘यह झूठ है, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को तो तेरह सौ मिलते हैं, तुम तो संस्कृत स्कूल के शिक्षक हो? यह कैसे हो सकता है?’’ वे बोले, ‘‘बात सही है, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को तेरह सौ रुपये हर माह मिलते हैं और मुझे अठारह सौ रुपये सालाना।’’ सभी लोग हॅसने लगे।
फिर एक ने उनके मस्तक की ओर इशारा कर कहा ‘‘यह चंदन इस प्रकार क्यों लगाते हो?’’ वे बोले ‘‘भैया! इससे दो फायदे हैं, एक तो हमारा सिरदर्द दूर हो जाता है और दूसरा ये कि दूसरों का सिरदर्द शुरु हो जाता है।’’ हाल में ठहाका लगा। अचानक फिर सब चुप।
इसके बाद, दिये गये विषय पर जब अग्निहोत्री जी ने अपना व्याख्यान प्रारम्भ किया तो लोग दाॅतों तले अँगुली दबाये रह गये और वे जो उपहास कर रहे थे वे तो शर्म से गड़े जा रहे थे। कार्यक्रम के अध्यक्ष बोले,
‘‘मैं दुखी हॅू, विश्वविद्यालय के विद्वानों ने भी बाहरी वेषभूषा को ही आभ्यान्तरिक लक्षणों का सूचक मान लिया है।’’
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