'अच्छा, नमस्कार! अब चलते हैं, हम जल्दी ही सूचित करेंगे ' दल बल सहित लड़की देखने आये लड़के के पिता ने रामेश्वर से कहा। रामेश्वर और उनका परिवार आशाभरी निगाहों में आदर सहित उन्हें बाहर तक भेजकर वापस आया और अगले ही क्षण से लड़के वालों के अंतिम उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। अनेक दिन प्रतीक्षा करते बीत जाने पर रामेश्वर की पत्नी ने अपनी ओर से ही पूछ लेने का परामर्श दिया। रामेश्वर बोला, ‘‘क्या फायदा, इससे पहले भी तो सात लोग यही कहकर गये पर किसी ने जबाब दिया? यही समझ लो आगे हाथ पैर चलाना अभी जारी रखना है।’’
हर बार देखने दिखाने तक बात आकर रुक जाया करती, कभी दहेज के कारण, कभी ऊँचाई के कारण, कभी रंग के कारण, कभी नौकरी के कारण, कभी लड़की के अधिक पढ़ा लिखा होने के कारण, कभी अकारण। रामेश्वर का परिवार दिन रात यह सोच कर मन बहलाये रहता कि उनकी तो एक ही लड़की है, जिनकी तीन चार होती हैं उनकी हालत क्या होती होगी , ईश्वर की जो इच्छा होगी वही होगा, आदि आदि।
एक शाम को इसी सोच में रामेश्वर को दुखित देख, मित्र विनोद ने कारण पूछा तो रामेश्वर को जैसे अपना बोझ कुछ कम होने का आभास हुआ और उसने अपनी पिछले आठ सालों की खोजपूर्ण तपस्या का आद्योपान्त वर्णन कर दिया। विनोद ने भी सहृदयता दिखाई और जैसा कि सामान्यतः सभी लोग धैर्य और ईश्वर पर भरोसा रखने का परामर्श देकर चले जाते हैं, वह भी वहाँ से इस समस्या पर सोचते हुए अपने घर चला आया। घर आने पर उससे, तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बेटी ने गणित के कुछ सवाल समझाने के लिये कहा, परन्तु वह, थोड़ी देर बाद समझा दूँगा, यह कहकर विस्तर पर लेट गया और उसे तेज नींद आ गयी। वह स्वप्न में देखता है कि रामेश्वर की तरह वह भी उन सभी परिस्थितियों से जूझ रहा है, लड़की की उम्र बहुत अधिक हो गयी है, कहीं पर कोई आशा दिखाई नहीं देती है, चारों ओर निराशा और भय ने जाल बिछा रखा है, पड़ोसी और रिश्तेदार सभी लोग , कुछ का कुछ कहने लगे हैं, घर से बाहर निकलने में लगता है जैसे कोई अपराधी होऊँ , पत्नी भी मुझे अकर्मण्य मानने लगी है, लड़की भी अपनी माॅं की तरह मुझे ही दोष देने में नहीं हिचकिचाती, जीवन में अपने को इतना असहाय और असफल समझने लगता है कि वह छत से कूद कर जान देने के लिये ज्योंही नीचे की ओर देखता है तो अधिक ऊँचाई होने से डर जाता है और हड़बड़ा कर चिल्लाते हुए जाग कर बैठ जाता है, पत्नी और वह छोटी सी बच्ची घबराकर उसके पास आकर पूछते हैं , क्या हुआ?
विनोद बच्ची को उठाकर छाती से लगाकर चिल्लाता है ‘‘ नहीं ! तू बिलकुल बड़ी न होना, मैं तुझे इतना सा ही देखते रहना चाहता हॅूं, तुझे गणित के सवाल ही समझते रहना चाहता हूॅ, तेरे साथ ही खेलते रहना चाहता हॅूं, नहीं ! नहीं! तुझे कहीं नहीं जाने दूँगा, तू मेरे पास ही रहेगी हमेशा ।‘‘
पत्नी और बच्ची दोनों डरे सहमे चुपचाप यह दृश्य देखते रहे , देखते रहे और विनोद अपने स्वप्न संसार में विचरण करते इसका उत्तर ढूँड़ रहा था कि, ‘‘ प्रकृति की यह अनुपम कृति क्या सचमुच दुखदायी है? ’’
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