Sunday, March 29, 2020

2 असली होली नकली होली

 2 असली होली नकली होली 

एक सेवानिवृत्त फिजिक्स के प्रोफेसर के घर, आसपास के आठ दस लड़के जिनमें तीन चार उच्छृंखल भी थे , होली का चंदा माँगने आये ।  प्रोफेसर ने सबको अपनी गृह वाटिका में बिठाया और समझाने लगे , ‘‘आपलोग होली का असली अर्थ जानते हैं?’’ लड़कों ने अपने अपने ढंग से वही पौराणिक किस्से सुनाते हुए बोले यह तो रंगों का त्यौहार है, आदि।  प्रोफेसर बोले नहीं , ये सब तो काल्पनिक  किस्से हैं सच्ची बात जानना हो तो सुनो,    
‘‘भौतिकवेत्ता ¼physicist½ कहते हैं कि किसी भी वस्तु का अपना कोई रंग नहीं होता , सभी रंग प्रकाश के ही होते हैं।  प्रकाश तरंगों की विभिन्न लम्बाइयां¼wave lengths½ ही रंग प्रदर्शित करती  हैं। जो वस्तु प्रकाश की जिन तरंग लम्बाइयों को परावर्तित करती है वह उसी रंग की दिखाई देती है अतः यदि कोई वस्तु प्रकाश विकिरण की  सभी तरंग लम्बाइयों को परावर्तित कर दे तो वह सफेद और सभी को शोषित कर ले तो काली दिखाई देती है। सफेद और काला कोई पृथक रंग नहीं हैं। ’’
लड़के शान्त।  
‘‘ मनोभौतिकीविद ¼psycho physicist½ कहते हैं कि मन के वैचारिक कम्पनों से बनने वाली  मानसिक तरंगें¼psychic waves½ भी व्यक्ति के चारों ओर अपना रंग पैटर्न बनाती हैं जिसे ‘‘आभामण्डल^^ ¼aaaaura कहते हैं। अनेक जन्मों के संस्कार भी इसी पैटर्न में विभिन्न परतों में संचित रहते हैं और पुनर्जन्म के लिए उत्तरदायी होते हैं।’’   
 ‘‘ मनोआत्मिक  विज्ञानी¼psycho spiritualists½   इन तरंगों (wave patterns½को वर्ण ¼colour½ कहते हैं।  यह लोग यह भी कहते हैं कि जिस परमसत्ता ¼cosmic entity½ ने यह समस्त ब्रह्माण्ड निर्मित किया है वह अवर्ण ¼colourless½ है परन्तु इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व रखने वाली सभी वस्तुओं के द्वारा प्रकाश तरंगों के परावर्तन करने के अनुसार ही वर्ण  ¼colour½ होते हैं क्योंकि ये सब उसी परमसत्ता की विचार तरंगें ही हैं।  अतः यदि उस परमसत्ता को प्राप्त करना है तो स्वयं को अवर्ण  बनाना होगा।  इसी सिद्धांत का पालन करते हुए अष्टांगयोगी प्रतिदिन अपनी त्रिकाल संध्या में  इन वर्णो को मनन, चिंतन ,कीर्तन और निदिध्यासन की विधियों द्वारा उस परमसत्ता को सौंपने का कार्य करते हैं जिसे वर्णार्घ्य  दान(offering of colours) कहते हैं। बोलचाल की भाषा में वे इसे ही असली होली खेलना कहते हैं। समझे ?’’
लड़के सुनते रहे।
‘‘हम लोगों ने काल्पनिक कहानियों के आधार पर कैसी विचित्र परम्पराएँ बना ली हैं कि होली के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़/ रंग फेकते हैं , अकथनीय अपशब्द कहकर मन की भड़ास निकलते हैं और कहते हैं कि ‘‘बुरा न मानो होली है‘‘, होली के लिए चंदा बटोरकर रोड के बीचोंबीच टनों लकड़ियाँ  जलाकर कभी न सुधर पाने वाले रोड खराब तो करते ही हैं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड  मिलाकर प्रदूषण फैलाते हैं , तथाकथित रंगों / कीचड़ भरे शरीर और कपड़ों को धोने में पानी और समय भी नष्ट करते  हैं।’’  
‘‘यह सब गलत है कि नहीं बोलो?’’
 इतना बोलना खत्म ही नहीं हुआ था कि दो उद्दंडी  लड़के आगे आये और जेब में रखे रंगों के पेकेट खोलकर प्रोफेसर का मुह और वस्त्रों को रंग से पोत डाला और बोले, ‘‘ आप योगियों की होली मनाओ हम तो भोगी हैं हमें अपने ढंग से होली मानाने दो’’  ! 
और, ‘होली है, होली है‘ कहते शोर मचाते सभी लड़के भाग खड़े. हुए । 

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