3 मनस्ताप
देश के बटवारे के समय बाल्यावस्था में ही सरदार अवतारसिंह विरदी अपने पिता के साथ लाहौर से पलायन करने को विवश हो गये और यहाँ वहाँ भटकते हुए अंत में हमारे नगर में बस गए। इस भाग दौड़ की आपाधापी में पिता का साथ तो छूटा ही, अवतार सिंह को नियमित पढाई लिखाई का मौका ही नहीं मिला । परन्तु , वे लकड़ी के मेजरमेंट और पैसे के हिसाब में इतने कुशल हुए कि क्षेत्र के प्रसिद्ध टिम्बर मर्चेंट हो गए। एक दिन मैं अपने मकान की दरवाजे खिड़कियों के लिए लकड़ी खरीदने की सलाह लेने उनके पास पहुॅंचा। उनके तीन छोटे छोटे बच्चे, मेरे पहुँचने से पहले, धमाचौकड़ी मचाते हुए उनसे कोई बढ़िया कहानी सुनाने की रट लगाये थे। सरदारजी बरामदे में पड़ी चारपाई पर लेटे, बडे ही सोच विचार में पड़े थे कि इन्हें क्या सुनाऊँ, शायद अपढ़ होने का दुःख अनुभव कर रहे हों । मैं आवाज देनेवाला ही था परन्तु यह दृश्य देखने चुपचाप गेट के बाहर ही खड़ा रहा। सरदार जी बच्चों सेे बोले,
‘आओ जी ! त्वानु मापारत दी कहानी सुणावां। ‘‘
बच्चे झटपट चारपाई पर उनसे सट कर वैठ गए।
‘‘हाँ जी ! तुसीं मापारत दा नम सुणा, जा नईं ?‘‘
बच्चे कोई हाँ जी बोले कोई न।
‘‘चंगा जी , तँ... मापारत विचों सी... पंज पंडवा। ‘‘
‘‘किन्ने जी ‘‘ ?
‘‘पंज।‘‘
‘‘हाँ जी ! ता... उना विचों सब तों बड्डा सी ‘दित्तर’, ते दूजा बड्डा तकड़ा सी ‘पिम्म’। हैं जी ! ते इक होर... , इक होर..... , ता... इक दा नम मैं पुल गिया जी। ‘‘
सुनकर बड़ा बच्चा बोला,
‘‘पापाजी! तुसी पंज विचों दो नम ही दस्से हन, और केन्दे हो इक दा नम पुल गिया ? "
‘‘ओ पुत्तर! मैं कोई पड्या वड्या नईं ना, इसलै पुलता वां "
सरदारजी बड़े दुखी हो बोलते बोलते रुक गए।
इतने में एक बच्चे ने गेट के पास मुझे देख कर उन्हें ध्यान दिलाया , वे जल्दी उठे और ‘सत्श्रीअकाल जी‘ कहते हुए अंदर आने को इशारा किया। ज्योंही मैं पहुंचा तो उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से, अपने बच्चों को महाभारत की कहानी सुनाने को मुझसे कहा, मैंने अपनी कहानी बाद में, पहले महाभारत की कहानी सुनाना प्रारम्भ की। सरदारजी भी अपने बच्चों के साथ उन्हीं की तरह बड़ी तल्लीनता से सुनने लगे। अचानक उनके हाथ का कड़ा बोल पड़ा,
‘‘ अवतार! तुझे भी पढ़ने का मौका मिला होता तो आज, इन बच्चों को तेरी ओर से इतनी निराशा न होती !’’
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