Monday, March 30, 2020

4 जी


मेरे पड़ोस में रहने वाले राजपूत जी के बुजुर्ग माता पिता तीर्थ यात्रा से लौटे। छठवीं में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने उनसे मिलकर पूॅछा, ‘‘माताजी ! आप कहाँ कहाँ घूम आयीं ?’’
 वे बोलीं , ‘‘अजुद्याजी, काशीजी ,मथुराजी, द्वारकाजी। अब , जगन्नाथपुरी जी के दर्शन और करना हैं। ’’
वापस आकर बेटी मुझ से पूछने लगी , ‘‘पापा! ये अयोध्या , काशी, मथुरा, जगन्नाथपुरी आदि स्थानों के नाम हैं या आदमियों के?’’
  ‘‘ये सब स्थानों के नाम हैं और कहीं कहीं  आदमियों के भी , क्यों? क्या बात है ?’’ मैंने पूछा।
 ‘‘मैं भी भूगोल में इन्हें पढ़ती हूँ कि ये तो स्थान हैं ,पर यह समझ में नहीं आता कि माताजी इन स्थानों के नाम के साथ ‘जी ‘ क्यों लगातीं हैं । कोई व्यक्ति हो तो फिर भी आदर के लिए ‘जी’ कहना ठीक है जैसे, मेरी सहेली दिविंदर कौर हर बात में हाँ जी , हाँ जी करती है। परन्तु  कल मेरी सहेली असीमा जैन कक्षा में लेट आई, मेडम ने इसका कारण पूछा तो कहती है ‘मंदिरजी‘ में रुकना पड़ा, इसलिए देर हुई।  कितनी अजीब बात है ? है न ? ’’
 ‘‘ ये स्थान पवित्र होते हैं  इसलिए आदर से जी लगाते हैं।’’
  ‘‘ अरे! आदमियों तक तो ठीक है पर स्थानों , पत्थरों, भवनों को ‘जी‘ कहना अटपटा सा नहीं लगता ?, पता नहीं यह कहाँ से प्रचलन शुरु हुआ। 
हमारी वार्ता सुन रहे, पास में बैठे कम बोलने बाले, उसके बाबा बोल पड़े, 
‘‘ वैदिक युग में किसी पढ़े लिखे  वरिष्ठ व्यक्ति को आदर देने के लिए ‘आर्य‘ कहा जाता था , फिर यजुर्वेदीय काल में ‘आर्ज‘ कहने लगे क्योंकि इस समय में ‘य’ को ‘ज’ उच्चारित किया जाता था जैसे, ‘यज्ञ को जग्य’, ‘योग को जोग’। फिर अरबी फारसी का जमाना आया तो ‘आर्ज’ बदलकर ‘अजी‘ हो गया, अब और अपभ्रंश होकर केवल ‘जी‘ बचा है । पर यह हमेशा व्यक्तियों के लिए ही आदरसूचक शब्द रहा है, मंदिरों , पत्थरों , किताबों या स्थानों के लिए इस प्रकार सम्बोधित करना व्याकरण के अनुसार गलत है। ’’
पास में टंगे पिंजड़े में बैठा तोता यह सुनकर चहचहा उठा।

No comments:

Post a Comment

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...