"प्रभु! देखो तुम्हारे परम भक्त लंकाधीश रावण कष्ट में हैं, वह तुम्हें मदद के लिये पुकार रहे हैं, उन्हें मरणान्तक कष्ट हो रहा है, छटपटा रहे हैं, देखो! "
प्रभु ध्यानमग्न हैं, पार्वती बार बार ध्यानाकर्षित करने की चेष्टा कर रहीं हैं।
"प्रभो! मैं ने कई बार देखा है कि अनेक पापियों और दुष्टों ने जब भी हृदय से तुम्हें पुकारा है तुम सब काम छोड़कर उनकी मदद के लिये तुरंत पहॅुंचे हो। माना कि रावण पातकी है पर है तो तुम्हारा परमभक्त, तुमने उसकी मदद नहीं की तो यह तो उसके साथ बड़ा अन्याय होगा? "
प्रभु ने कुछ क्षणों के लिये आँखे खोलीं और बोले.....
"पार्वती! रावण यदि पातकी होता तो भी मैं एक बार उसे मदद करने के लिये विचार कर सकता था परंतु वह तो महापातकी है, उसने एक नारी का अपहरण करने का अक्षम्य कृत्य तो किया ही है; परंतु वरानने! क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि उसने यह कार्य साधु के वेश में किया। उसके इस कार्य से अब सभी साधुओं पर संदेह किया जायेगा, उन पर कोई विश्वास नहीं करेगा, यह तो समाज की अपूर्णीय क्षति है, इसका परिणाम उसे भोगना ही होगा। "
..... और, प्रभु फिर से ध्यानस्थ.....।
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