Monday, June 1, 2020

31 वैतरणी....

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 विधिविधान से पिता की अस्थियों के विसर्जन हेतु बुजुर्गो ने समझाया कि प्रयाग में भागीरथी से वढ़कर दूसरा कोई स्थान नहीं हो सकता है। इसलिये मुकद्दम सिंह इलाहाबाद वाली रेल में जा बैठा। वहाॅं पहुंचने से पहले, नैनी से ही मुंडा सिर देख वैतरणी पार कराने वाले यमराज के तीन एजेंटों ने आ घेरा। अपने अपने बही खाते लेकर ये इस प्रकार पीछे पड़े कि उसे अपनी सीट पर बैठ  पाना मुश्किल  हो गया। वह  कुछ बोल ही नहीं पा रहा था कि वे आपस में ही उलझ पड़े और सामने बैठे हुए मुझे लगा कि अब मैं भी इनसे सुरक्षित नहीं रह पाऊंगा। मैं उन से बचने का उपाय सोच ही रहा था कि जीआरपी का एक सबइंस्पेक्टर और दो जवान डिब्बे में घुसते ही पूछने लगे  "यहाॅं पंडे तो नहीं आये?"
 एक यात्री ने आगे की ओर का इशारा किया।
 हमारी सीट पर जमे पंडे, कुछ समझ पाते कि पुलिस वाले उन पर टूट पड़े ।
 वे चिल्लाये "हम तो पंडा हैं हमने क्या किया?"
 इंस्पेक्टर बोला, "थाना चलो तीनों को पुरखों सहित वैतरणी पार कराना है।"

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