चंदू के हाथ में सोने का आभूषण देख राजू और रवि बहस करने लगे । कोई कहता नेकलेस, कोई लाकेट और कोई चेन कहता । शोर सुन कर बाबा बोले, "राजू ! पिछले दिन, मैंने तुम लोगों को हर प्रकार की बहस होने के पीछे मूल कारण क्या बताया था, बोलो ?" सभी चुप।
बाबा ने स्थिति को गंभीर जानकर कहा, "आओ तुम्हें एक किस्सा सुनाते हैं। इस पर चिंतन करना और निष्कर्ष हमें बताना....।"
एकबार गौतम बुद्ध के पास लोगों के दो अलग अलग ग्रुप परस्पर झगड़ते हुए आये।
एक ग्रुप में तथाकथित पंडित लोग अपनी दलील दे रहे थे कि ‘‘ईश्वर है‘‘ और दूसरे ग्रुप में कुछ आधुनिक पढ़े लिखे थे जो कह रहे थेे कि ‘‘ ईश्वर नहीं है‘‘।
पंडितों ने पूछा- "महात्मन्! किं ईश्वरः अत्थि? (अर्थात् क्या ईश्वर का अस्तित्व होता है?)"
गौतम बुद्ध चुप रहे।
इसके बाद दूसरे ग्रुप ने पूछा- "महोदय! किं ईश्वरः नात्थि? ( अर्थात् क्या ईश्वर का अस्तित्व नहीं होता है?)"
गौतम बुद्ध फिर चुप रहे।
इसपर बाद में, पंडितों का एक ग्रुप यह तर्क देता रहा कि देखो! ईश्वर है और चूंकि उसका वर्णन किसी भी प्रकार शब्दों में नहीं किया जा सकता, इसीलिये बुद्ध चुप रहे...।
दूसरा ग्रुप यह तर्क देता रहा कि ईश्वर होता ही नहीं है इसलिये बुद्ध क्या कहते...।
यह सुनते ही रवि बोला, "बाबा! मुझे याद आ गया, हर बहस के पीछे कारण होता है उसके मूल तत्व को भूल जाने का।"
चंदू बोली "क्या मतलब?"
"अरे! हमारी गलती यह है कि आभूषणों को दिये गये नाम और रूप के आधार पर उनके अस्तित्व को हम पृथक पृथक मानते हैं पर मूल तत्व ‘सोना‘ जिसके वे बने हुए हैं उसे भूल गये , यही विवाद की जड़ है।"
बाबा बोले, "तुमने सही समझा, यही कारण है कि बुद्ध चुप रहे। वे दोनों ग्रुप परस्पर अपना सापेक्षिक अस्तित्व तो मानते हैं पर उन सबका अस्तित्व जिस निर्पेक्ष सत्ता के सापेक्ष है उसे भूल जाते हैं। "
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