नगर सेठ, अपने धंधे के अधिकाधिक पल्लवित, पुष्पित और फलित होने के आशीर्वाद की अपेक्षा में एक सच्चे संत के पास आदराॅंजली भेंट करने जा पहुंचे। सेठजी को संत के पूर्व के जीवन का कुछ कुछ पता था कि उन्होंने इतना अधिक पढ़लिख कर क्लास वन सरकारी पोस्ट को ही नहीं संपूर्ण सम्पत्ति को, तिनके की तरह त्याग कर ईश्वरीय मार्ग में कदम रखा और अपने को तपाकर परमसिद्ध अवस्था प्राप्त कर ली है। इसीलिये प्रणाम करते हुए वह बोले,
‘‘भगवन्! आपके त्याग और तपस्या की कीर्ति दिगदिगंत में इस प्रकार फैली है कि मैं आपके दर्शनों की तीब्र जिज्ञासा को रोक ही न सका और श्रीचरणों में आ बैठा, प्रभो! कृपा करें।’’
संत बोले, ‘‘श्रीमन्! मेरा कोई बड़ा त्याग नहीं है। मूल्यहीन इन भौतिक वस्तुओं के उपभोग को छोड़कर, उस अमूल्य परमसत्ता को पा लेना, क्या बहुत बड़ा त्याग कहला सकता है? अरे! असली त्यागी तो आप हैं जो उस अमूल्य आनन्दघन परमसत्ता को त्याग कर भौतिक जगत की इन नाशवान वस्तुओं में ही प्रसन्न हैं.! ’’
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