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विद्वान भिखारी
‘‘ बहुत दिनों में दिखे? कहीं बाहर गए थे क्या?’’
‘‘ नहीं तो। आजकल मंदिरों में भगवानों की रिसर्च में जुटा हॅूं।’’
‘‘ अजीब बात है, भगवानों की रिसर्च?’’
‘‘ जी हाॅं, पर आप नहीं समझेंगे।’’
‘‘ फिर भी, कुछ तो समझ में आएगा यदि आप जैसा विद्वान समझाएगा।’’
‘‘बात ये है कि सभी लोग मंदिर के भीतर जाते हैं और मैं बाहर ही बैठता हॅूं, भिखारियों के बीच।’’
‘‘ लेकिन इसमें रिसर्च की क्या बात है, भाग्य से प्रताड़ित बेचारे भिखारी।’’
‘‘ मैं ने पाया है कि वे विपन्न होते हुए भी विद्वान होते हैं।’’
‘‘ ये भी कोई नयी बात है? अधिकांश विद्वान, विपन्न ही होते हैं।’’
‘‘ नहीं, इनकी विपन्नता और विद्वत्ता अनूठी होती है, उनकी एक दिन की वार्ता सुनो-
‘काय रे! परों तें ओ तरप काय दौर लगाउत जा रव तो?’
‘ का तोय पता नई, ओ रिखबदास सेठ के लरका कीं तेरईं हती’
‘ हाॅं, बौई दारू ठेकेदार सेठ जे की तेज कार पुल पे लुड़क गई ती’
‘ हाॅं बौई, ओ के लरका ने सोई फांसी लगा लई ती’
‘ ठीकई तो है, जे के जैसे नदिया नारे, ऊंसई ओ के भरका, जे के जैसे बापमताई, ऊंसई ओ के लरका।’
(बुंदेली शब्द- काय/क्यों। परों/परसों। ओ तरप/ उस तरफ। दौर/दौड़। रव तो/रहा था। तोय/तुम्हें। नई/नहीं। लरका/पुत्र। हती/ती/ थी। बौई/वही। ऊंसई/उसीप्रकार। जेके/ जिसके। ओके/उसके। भरका/लंबी चैड़ी खाइयाॅं, खंदक। बापमताई/ माता पिता।)
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