पंडित दीनानाथ शास्त्री अपने क्षेत्र में कर्मकांडीय पुरोहित के रूप में देवताओं की तरह पूजे जाते थे क्योंकि दूर दूर के अनेक विद्वान पंडितों को शास्त्रार्थ में भी वह परास्त कर चुके थे। विवाह के अनेक वर्ष बाद उत्पन्न एकमेव पुत्र के लिए वह अपनी ही तरह उद्भट विद्वान बनाना चाहते थे इसलिए स्कूली शिक्षा के साथ साथ घर पर संस्कृत पढ़ने पर अधिक जोर देते। शास्त्री जी अपनी त्रिकाल संध्या के बाद प्रतिदिन कहा करते,
‘‘ सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय, बृन्दावन विहारीलाल की जय, उमापति महादेव की जय, काशी विश्वनाथ की जय, उज्जयनी के महाकाल की जय, रामेश्वरम् की जय, जगन्नाथजी की जय, वैष्णव देवी की जय, सिद्धविनायक की जय ..... ’’
आदि, जब तक नाम याद आते गये तब तक उच्चारण करते जाते, फिर कहते ..
‘‘ करोड़ों देवताओं में से सबके नामों को नहीं ले पा रहा हॅूं सो कृपया वे नाराज न होवें, उनकी भी जय।’’
एक दिन, संध्या करने के बाद शास्त्री जी ज्योंही पूजा स्थल से निकले कि पुत्र ने कहा,
‘‘ पिताजी, रामरक्षास्त्रोत के एक श्लोक,
.... माता रामो मत्पिता रामचंद्रः, स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः
सर्वस्व मे रामचन्द्रो दयालु, नान्यं जाने नैव जाने न जाने। ....
में से अंतिम पद, नान्यं जाने नैव जाने न जाने, को समझने में कठिनाई जा रही है ’’
शास्त्री जी तुरन्त बोले, ‘‘ इसका अर्थ है, हे राम! मैं तुम्हारे सिवा न तो किसी को जानता हूॅं, और न ही जानना चाहता हूॅं।’’
‘‘ तो, राम भक्त होते हुए आप रोज संध्या करने के बाद उनसे असत्य क्यों बोलते हैं ?’’
पसीने से स्नान करते हुए शास्त्री जी के मस्तक पर लगा त्रिपुंड कह उठा,
‘‘ तूने मुझे पराजित कर दिया वत्स। ’’
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