(फंतासी शैली में लघुकथा)
सभाकक्ष में श्रोताओं की उपस्थिति बता रही थी कि कथावाचक असाधारण ज्ञानी हैं। भारत के राम भक्तों के बीच यह अटूट विश्वास है कि जहाॅं कहीं भी रामकथा होती है वहाॅं हनुमानजी अवश्य ही पीछे की पंक्ति में कहीं बैठे कथा सुन रहे होते हैं। अशोक वाटिका का प्रसंग आने पर कथावाचक बोले,
‘‘ वाटिका में अशोक बृक्ष के नीचे सफेद साड़ी पहने हुए सीतामाता बैठी हैं, चारों ओर सफेद फूल खिले हैं, रावण अपनी हॅुकार भरते उन्हें धमका रहा है ... ’’
आगे वे कुछ कह पाते कि पीछे से एक सज्जन ने खड़े होकर विनम्रता पूर्वक कहा,
‘‘ नहीं पंडितजी! सीतामाता सफेद नहीं, लाल साड़ी पहने हुए थीं और चारों ओर लाल ही फूल खिले थे।’’
‘‘ महानुभाव! आप कौन हैं? ’’ मुस्कराते हुए कथावाचक ने पूछा।
‘‘ मैं? अरे! मैं हनुमान। मैंने ही सीतामाता की खोज, अशोक वाटिका में की थी।’’
‘हनुमान’ नाम सुनकर सभी श्रोता उत्सुकता और आश्चर्य से पीछे की ओर देखने लगे।
कथावाचक ने मोर्चा सम्हाला ,
‘‘ ओ हो! हनुमानजी, प्रणाम। लेकिन बताइए कि यह दृश्य देखकर क्या आपको क्रोध नहीं आया था?’’
‘‘ बिलकुल आया था, वो तो श्रीराम प्रभु की आज्ञा नहीं थी अन्यथा मैं वहीं पर रावण के सिर के टुकड़े टुकड़े कर देता।’’
‘‘ हाॅं! ये बात थी न! इसी क्रोध से आपके नेत्र लाल हो गए थे और सभी चीजें लाल लाल दिखाई देने लगीं थीं, समझे, बैठो! अब आगे की कथा सुनो।’’
हनुमानजी ने कुछ बोलना चाहा लेकिन श्रोताओं की ओर से जोरदार ध्वनि हो उठी,
‘‘वाह! वाह! अद्वितीय व्याख्या वाह!! वाह!!’’
और, जिस मच्छर का रूप धरकर उन्होंने लंकापुरी में प्रवेश किया था वही कान के पास भन्भनाया,
‘‘हनुमानजी! देखा! प्रत्यक्ष दृष्टा को भी गलत सिद्ध कर दिया न? यह राम का ‘भारत’ नहीं, कलियुगीन रावण का है! यहाॅं सीताओं का तो रोज अपहरण होता है पर उनकी खोज करने और अपहरणकर्ताओं को दंड देने वाला राम कहीं दिखाई नहीं देता!!’’
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