‘‘ मैं कहता था न! कर्मफल स्वयं को ही भोगना पड़ता है, अब गया !! मृत्यु होने तक जेल में ही सड़ेगा ढोंगी।’’
‘‘ किसकी बात कर रहे हो? ’’
‘‘ जिसे तुमने गुरु बनाया था, भगवान मानकर पूजती थीं वही, आसूमल उर्फ आसाराम।’’
‘‘क्या कहते हो?’’
‘‘ लो, पढ़ लो आज का पेपर।’’
‘‘ नहीं, नहीं, जरूर कोई साजिश है, मैं नहीं मानती। जिसके पैरों में पड़े अधिकारी, नेता, मंत्री, व्यापारी सब गिड़गिड़ाते रहते थे, वह ऐसा नहीं हो सकता, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में स्थिति बदल जाएगी।
‘‘ भाई! तुम्हारे अंधविश्वास और अंधानुकरण से मैं तो क्या भगवान भी नहीं जीत सकते।’’
जोर जोर से हो रही बातें सुन पड़ौसी खोट्टामल घपलानी आकर बोले,
‘‘ साॅंईं! क्या बात है, सुवेरे सुवेरे किस बात का झगड़ा होने लगा?’’
‘‘ सत्य की विजय और न्याय की प्रतिष्ठा होने से कुछ लोगों को बड़ा दुख पहॅुचा है।’’
‘‘ मैं भी तो समझॅूं क्या हुआ?’’
‘‘ अरे, वही आसाराम जिसे तुम तो आदर्श मानते हो अब, मरते दम तक जेल में सड़ेगा।’’
जैसे मौत के मुॅंह से बचकर निकले हों, खोट्टामल गहरी साॅंस लेकर बोले,
‘‘ चलो, अच्छा ही हुआ’’
‘‘ लेकिन तुम क्यों खुश हुए? तुम ने तो दीक्षा ली थी, गुरु को सजा होने से तुम्हें तो दुखी होना चाहिए? उसके अरेस्ट होने पर तो प्रदर्शन कर रहे थे?’’
‘‘ दीक्षा नहीं, लोन लिया था पन्द्रह लाख का। अब, चुकाना नहीं पड़ेगा .. ..।’’
‘‘ अब समझा। इस फैसले से दो प्रकार के लोग ही खुश हैं; पहले, दुराचारी को दण्ड मिलने पर न्याय की प्रतिष्ठा होने से और दूसरे, आसाराम के कर्जदार।
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