Sunday, September 27, 2020

175 फरिश्ते या शिकारी ?

पिता के असामयिक निधन के बाद दिनेश को अपनी घरेलु जिम्मेवारियों के बीच आगे पढ़ाई जारी रखना असंभव था परन्तु, माॅं के प्रोत्साहन से अभावों के बीच भी उसने अपनी डिग्री पूरी कर अच्छी सरकारी नौकरी पा ली। रिश्तेदार या अन्य लोग जो कभी हाल चाल भी नहीं पूछते थे अब निकटता बढ़ाने लगे और, प्रायः रोज ही एक न एक, जाने अन्जाने लोग विवाह के लिए प्रस्ताव लाने लगे। दिनेश सभी से विनम्रता पूर्वक यह कह कर टालता जाता कि अभी उसे भाइयों को पढ़ाना है, घर की आर्थिक स्थिति को सुधारना है, इसके बाद ही कुछ निर्णय करेगा।

इसी क्रम में, धन और पद का प्रभाव डालते हुए उसके विभाग के एक अधिकारी ने भी यही प्रस्ताव दिया पर उसने अपनी पारिवारिक और आर्थिक स्थिति उनके समकक्ष न होने के विचार से मौन रहना चाहा तब, वे सज्जन बोले,

‘‘अरे, क्यों चिन्ता करते हो संबंध तो हो जाने दो, सब अनुकूल हो जाएगा’’

‘‘ नहीं सर! हमारा ग्रामीण परिवेश में ढला निम्न स्तरीय परिवार, आपकी प्रतिष्ठा और शहरी उच्च स्तर से बहुत छोटा है। आपकी बेटी मेरे घर में वह सुविधाएं नहीं पा सकेगी जो आपके घर में सहजता से उपलब्ध होती हैं इसलिए, यह संबंध उचित नहीं है।’’

‘‘ पर तुम्हें कौन सा गांव में ही रहना है, हमारे यहाॅं शहर में रहना, वहीं पर ट्रान्सफर करा देंगे ’’

‘‘ सर! अपने घर में उजाला करने के लिए आप, मेरे घर में अंधेरा क्यों करना चाहते हैं ?’’ 

‘‘ डियर फ्रेंड! अपने सुनहरे भविष्य को क्यों दुतकार रहे हो ?’’

‘‘ सर! आपकी दयालुता के लिये आभार। लेकिन, मेरा सीधा सादा मन कहता है कि मेरा सुनहला भविष्य मेरे पराक्रम की नीव पर ही स्थिर रह सकेगा किसी फरिश्ते की कृपा पर नहीं। ’’

सुनते ही, आफीसर की कार का हार्न जोर से बज उठा।


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