Sunday, September 27, 2020

177 संस्मरण

उस दिन बेंक से पैसे निकालने के लिए खिड़की पर लगी लम्बी लाइन में पीछे खड़े होकर अपने क्रम आने की प्रतीक्षा करने लगा। लाइन पीछे की ओर बढ़ती जा रही थी पर आगे टस से मस भी नहीं हो रही थी। जिसका क्रम आ जाता वह सोचता बस उसने जग जीत लिया। मुझसे आगे तीसरे क्रम पर खड़े सज्जन के साथ उनका चार पांच साल का बेटा भी उनका हाथ पकड़े लाइन में खड़े खड़े जब थक गया तब वहीं काऊंटर की दीवार से टिक कर बैठ गया, शायद वह अस्वस्थ था। इतने में तीन महिलायें आकर खिड़की के पास अलग से लाइन बना कर खड़ी हो गईं, देखते ही बन्दूकधारी गार्ड बोला,‘‘ महिलाओं की अलग से लाइन लगाना अब बंद हो चुका है आप लोग इसी लाइन में पीछे खड़ी हो जाइए ।’’ उनके साथ आए एक सज्जन ने उन महिलाओं की ओर से संक्षिप्त बकालत की परन्तु गार्ड की रोबदार मूछें देख वे चुप हो गए। मुझे तत्क्षण लगभग दो वर्ष पूर्व लिखी गई अपनी लघुकथा ‘‘लाइन’’ याद आ गई और यह घटना देखकर लगा जैसे समाज पर मेरी लघुकथा का प्रभाव पड़ने लगा हो।

मंदमंथर गति से घटती हुई लाइन में बहुत देर बाद मुझसे तीसरे क्रम में आगे खड़े व्यक्ति का क्रम आने पर उन्हें लगा कि अन्ततः ईश्वर ने उनकी सुन ही ली। उनकी पासबुक और विदड्राल फार्म लेकर बाबू ने ज्यों ही उनका एकाऊंट देखा तो उन्होंने कहा ‘‘ भाई साब! आपके खाते में केवल पन्द्रह सौ रुपये बचे हैं, नियमानुसार कम से कम तीन हजार रुपए खाते में बने रहना चाहिए, आप इतनी ही राशि और जमा कर दीजिए अन्यथा आपको फाइन देना पड़ेगा।’’ यह सुनकर सज्जन पसीने से नहा गये; वह कुछ कह ही न पाए कि पीछे वाले सज्जन बोले ‘‘ हटिए मेरा नंबर आ गया’’। वह एक कदम बाजू में हुए ही थे कि वहीं बैठा उनका बेटा बोल पड़ा‘‘ पापा! पैसे मिल गए?’’ 

पापा धीरे धीरे बाहर की ओर चलते हुए बड़बड़ाते जा रहे थे , ‘वाह री किस्मत! पैसे होते हुए भी मेरे किसी काम के नहीं हैं!’  और बेटा, उनका हाथ पकड़े बार बार कह रहा था, ‘‘ क्या कहा पापा! पैसे मिल गए?’’ इधर खिड़की पर मेरा जग जीतने वाला क्रम आ चुका था।


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