‘‘ ये क्या ? पूर्वजों के प्रति तुम्हारा लेशमात्र भी सम्मान नहीं है ?’’
‘‘ क्यों ? मैंने क्या किया ?’’
‘‘ अरे ! क्या नहीं किया, तुमने तो पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं को नष्ट ही कर दिया।’’
‘‘ ऐसी परम्पराओं का बोझ ढोने से क्या फायदा, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार न हो’’
‘‘ तो क्या हमारे पूर्वज मूर्ख थे जिन्होंने इन्हें प्रारंभ किया ?’’
‘‘ नहीं, तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार जो उन्हें अच्छा लगा उसका ही उन्होंने पालन किया होगा । ’’
‘‘ तो तुम्हें उनका अनुसरण करने में लज्जा क्यों आती है ?’’
‘‘सभी जानते हैं कि देश, काल और पात्र के अनुसार परिस्थितियों के बदल जाने पर स्थापित मान्यताएं भी बदल जाती हैं। इसे ही प्रगति कहते हैं। आज की परिस्थितियों में वे सब औचित्यहीन हो गई हैं।’’
‘‘ अरे मूर्ख ! तू इतना पढ़ लिख गया है कि खानदानी परम्पराओं को ही नष्ट कर रहा है और कहता है इसे प्रगति कहते हैं ?’’
‘‘ अच्छा ! यह बताओ, पूर्वज धोती पहनते थे, पैदल या बैलगाड़ी में यात्रा करते थे, पेड़ पौधों की छाल, जड़ों और रस से उपचार किया करते थे लेकिन अब सभी लोग पेंट शर्ट पहनते हैं, बस, रेल और वायुयान में यात्रा करते हैं, आधुनिक विधियों से बनाई दवाएं और इंजेक्शनों से अपना उपचार करते हैं, क्यों ?’’
‘‘ तू अपना तर्क ज्ञान आने पास रख और पूर्वजों की परम्परा के अनुसार जैसा मैं कहता हॅूं वही कर।’’
‘‘ नहीं! जो तर्क, विज्ञान और विवेक पर आधारित हो उसके अनुसार चलने ही पूर्वजों को प्रसन्नता मिलेगी न कि उनके द्वारा की गई त्रुटियों को दुहराते जाने से।’’
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