गरीबी की ठोकरों से लड़ते झगड़ते दिनेश ने मशीनिष्ट का काम सीखकर अपनी मोटर बाइंडिंग की दुकान तिवारी जी के मकान के दो कमरे किराए पर लेकर खोल ली और वहीं रहने लगा। स्वभाव से कृपण तिवारी जी मृदुभाषी थे और बेटा बेटा कहकर पुकारने के कारण दिनेश और उसकी पत्नी भी उन्हें समतुल्य आदर देते, समय पर किराया देते और अपने काम में लगे रहते। अचानक तिवारीजी के घर के सीलिंग फैन और कूलर खराब हुए तब उन्हें सुधारने के लिए दिनेश को उनके घर में प्रवेश मिला । दिनेश ने रीवाइंडिग कर उन्हें ठीक कर दिया। एक सप्ताह तक जब तिवारी जी से इस काम के पैसे नहीं मिले तब संकोचपूर्वक उसने पैसे मांग ही लिये।
आश्चर्य दर्शाते तिवारी जी बोले ‘‘ काहे के पैसे बेटा?’’
‘‘पंखे और कूलर रिपेयरिंग के अंकल!’’
‘‘कितने हुये?’’
‘‘साढ़े तीन सौ।’’
‘‘क्या बेटा, मैं तो तुम्हें घर का लड़का मानता हूॅं और बताओ, तुम हो कि..... क्या कहें!’’
‘‘अरे, साॅरी अंकल, कोई बात नहीं।’’
अगले माह तारीख निकल जाने पर भी दिनेश किराया देने नहीं गया, दूसरे माह भी नहीं और तीसरे माह भी नहीं, प्रतीक्षा करते तंग आए तिवारी जी बोले,
‘‘दिनेश बेटा! क्या बात है किराया तीन माह से नहीं दिया, क्या कुछ... ?’’
‘‘ अरे नहीं अंकल! उस दिन आपने ही तो कहा था कि मैं आपके घर का लड़का ही हॅूं, अब यदि मैं किराया देता तो शायद आपको बुरा लगता इसीलिए..., आखिर, अपने बेटे से बाप किराया कैसे ले सकता है?’’
‘‘ अच्छा! तो रिपेयरिंग के कितने पैसे हुए तुम्हारे?’’
‘‘ अंकल! केवल साढ़े तीन सौ रुपए ’’
‘‘ और तीन माह का किराया हुआ साढ़े चार सौ रुपए? हुए कि नहीं? ’’
‘‘ जी अंकल !’’
‘‘ तो लाओ बकाया एक सौ रुपए?’’
‘‘ जी अंकल! ये लीजिए।’’
दरवाजे की ओट से पूरा दृश्य देख रही दिनेश की पत्नी बोल पड़ी,
‘‘ कौन कहता है कि वसूली केवल बल प्रयोग से ही हो सकती है’’
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