किसी जरूरतमन्द व्यक्ति को नौकरी मिल सके यह सोचकर घर से सम्पन्न ठाकुर दुर्लभ सिंह ने स्वैच्छिक सेवानिवृत हो भजनपूजन करते हुए समाज सेवा करने का व्रत ले लिया। मंदिर के पुजारी से उन्होंने विधिवत त्रिकालसंध्या पूजन की विधि सीखी और नियमित रूप से इसे करने लगे। एक दिन जब वह प्रातःकालीन संध्या करने मंदिर पहॅंुचे तो मंदिर के पुजारी बोले,
‘‘ ठाकुर जी ! आज तो सूर्य ग्रहण है सबेरे से ही सूतक लगा है, ग्रहण के समय भगवान कष्ट में होते हैं अतः उनकी पूजा अर्चना करने का निषेध रहता है, अब तो ग्रहण समाप्त होने के बाद ही संध्या करना।’’
दुर्लभ सिंह लौटते हुए सोचने लगे, अजीब बात है, मरने पर सूतक! जन्म लेने पर सूतक! भगवान को कष्ट ! कष्टों को दूर करने वाले को कष्ट? संध्या वर्जित, पूजा वर्जित, इतना तक कि कपाट भी बंद दर्शन भी वर्जित? दुखी हो, घर में भी वे इसी चिन्तन में लगे रहे कि आखिर ईश्वरीय कार्य में किसी भी प्रकार की वर्जना क्यांे? मंदिर ही क्यों? त्रिकाल संध्या ही क्यों? अपने दैनिक कार्य करते हुए सर्वकालीन ईश चिन्तन क्यों नहीं?
और, अगले दिन से उन्होंने मंदिर न जाकर वर्जनारहित अपनी सर्वकालीन पूजा करना प्रारंभ कर दी। कई दिनों से मंदिर में न पहॅुचने पर पुजारी यह सोचकर कि शायद दुर्लभ सिंह बीमार हों, उनके घर पहुँचे ।
‘‘ ठाकुरजी ! आपका स्वास्थ्य तो ठीक ही दिखता है, पर संध्या करने कई दिनों से नहीं आए, क्या बात है?’’
‘‘ पुजारी महाराज ! मेरे घर में ‘ मोह रूपी ’ माता मर गई है और ‘ बोध रूपी ’ पुत्र ने जन्म लिया है, अब आप ही बताएं दो, दो सूतकों के होते संध्या करने का अवसर कहाॅं?’’
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