Tuesday, September 29, 2020

184 आत्मबोध

 ‘‘ क्यों दादा! उस दूकान पर नौकरी करने वाले ये सज्जन कौन हैं, उम्र के  अंतिम समय में भी बड़ी तल्लीनता से जुटे रहते हैं, किसी से बातचीत भी नहीं करते और हमेशा प्रसन्न ही देखे जाते हैं।’’

‘‘ कौन? वो ‘किराने’ की दूकान पर ?

‘‘ हाॅं, वही ।’’

‘‘ जानकर क्या करोगे, मैं उन्हें अच्छी तरह पहचानता हॅूं परन्तु उन्होंने अपने बारे में किसी से कुछ भी बताने के लिए मना किया है।’’

‘‘ पर क्यों, क्या किसी का कत्ल करके छिपा हुआ है?’’

‘‘ नहीं, ऐसा तो स्वप्न में भी न सोचना, समझे? ’’

‘‘ तो ऐसा रहस्य क्या है जो गोपनीय रखा गया है?’’

‘‘ अरे क्यों कुरेदते हो, बात स्वाभिमान की है और कुछ नहीं।’’

‘‘ अरे भाई! मैं जान जाऊंगा तो कौनसी मुसीबत आ जाएगी, जानकर हम भी प्रोत्साहित होंगे और दूसरों को भी प्रोत्साहित करेंगे।’’

‘‘ यही तो डर है, उन्हें पता चल गया तो वे उसी क्षण चले जाएंगे और मैं नहीं चाहता कि वह यहाॅं से जाएं। ’’

‘‘ तो तुम अपने किसी स्वार्थ के लिए ... ?’’

‘‘ नहीं, नहीं, वह बात नहीं है वास्तविकता पता चल जाने पर यहाॅं उन्हें कोई भी व्यक्ति अपने घर में नहीं रखेगा; मैं नहीं चाहता कि इतना आदरणीय विद्वान व्यक्ति मुझ रिटायर्ड फौजी के कारण व्यर्थ ही कष्ट उठाए।’’

‘‘ अब तो आपने और अधिक उत्सुकता बढ़ा दी है, मैं कसम खाता हूॅं किसी को नहीं बताऊंगा परन्तु सच्चाई जानकर मैं अपने को धन्य ही समझूंगा।’’

‘‘ तो सुनो, जहाॅं मैं सैनिक था उसी राजदरवार में यह सज्जन मंत्री थे, बड़े ही विद्वान और सबके आदरणीय। अचानक उनके मन में यह बात आई कि केवल अपना पेट पालने के लिए मैं राजा की झूठी प्रशंसा कब तक करता रहॅूंगा; उसकी हाॅं में हाॅं कब तक मिलाता रहॅूंगा, जिस काम के लिए यह जीवन मिला है वह तो कभी कर ही न पाऊंगा और, अगले ही क्षण वे किसी को बिना बताए अपनी सम्पत्ति और उस राज्य दोनांे को छोडकर वेश बदलकर यहाॅं छः घंटे काम करने लगे, शेष समय में भग्वदचिंतन।’’ 


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