Thursday, October 1, 2020

192 (संसार सागर )

निस्तेज रतन

पूर्वजों से प्राप्त विपुल सम्पदा को रतनचन्द ने अपने पराक्रम और व्यवसाय से कई गुना बढ़ा लिया। एरिया मेें उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता और   क्रमशः तीन पुत्र पाकर तो वे अपने स्वप्नों के सम्राट हो गए। विवाहोपरान्त बड़े बेटे ने क्रमशः दो कन्याओं को जन्म दिया जिनसे उनकी प्रसन्नता में कमी आई और महालक्ष्मी का स्वरूप कहलाने वाली बड़ी बहु अब अशुभ लगने लगी। और, तब तो वह नागिन की तरह डसती लगने लगी जब बड़े बेटे का किसी दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। उनके इस व्यवहार से वह दोनों पुत्रियों सहित अपने मायके में सदा के लिए चली गई। समयानुसार दूसरे ने चार कन्याओं को और तीसरे ने एक कन्या और एक पुत्र को जन्म दिया । रतनचन्द की सम्पूर्ण दृष्टि अपने छोटे लड़के पर केन्द्रित हो गई क्योंकि उनके विचार में वही उनके कुलगोत्र को आगे बढ़ाने में सफल हुआ था। दूसरा लड़का जिसकी चार कन्याएं थीं  उसे रतनचन्द परमशत्रु मानते थे भले ही वही पूरे व्यवसाय को सम्हाले हुए था। अचानक बीमारी के आक्रमण से आसन्न मृत्यु के संकेत पाकर रतनचन्द ने अपने पूरे व्यवसाय और सम्पत्ति को अपने छोटे पुत्र के नाम कर दिया और अन्तिम साॅंस ले ली। अपने पिता के इस निर्णय के विरुद्ध दूसरे लड़के ने कोर्ट में चुनौती दी और छोटे भाई से अपना हिस्सा माॅंगा। कोर्ट में इस प्रकार के केस पीढ़ियों तक चलते हैं और वही हुआ, छोटे भाई की अचानक मृत्यु हो गई और उसका लड़का स्वभाविक रूप से पूरी जायदाद का स्वामी बन गया और अपने पिता पर चाचा द्वारा चलाये जा रहे केस में बकीलों के माध्यम से कार्यवाही में भाग लेने लगा। पिता की बरसी पर श्रद्धाँजली देने आए समाज के अन्य लोगों और रिश्तेदारों की उपस्थिति में चाचा ने कहा,

‘‘ सभी के सामने मैं निवेदन करता हॅूं कि आप लोग इस बच्चे को समझाएं। मेरा कोई पुत्र नहीं है, यदि यह मेरे पुत्र की तरह हमारे साथ रहे तो सभी कानूनी विवाद समाप्त कर शाॅंतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है।’’

भतीजा बोला, ‘‘ सभी जानते हैं कि मेरे दादाजी ने मेरे कारण ही मेरे पिता के नाम पूरी जायदाद की थी अतः अब उस पर मेरे अलावा और किसी का हक नहीं है, रही बात कोर्ट की तो वहाॅं तो आप ही गए थे, हम नहीं ।’’

अब, उनकी चारों बेटियाँ और दामाद कोर्ट में चल रहे सभी केसों को जारी रखे हुए हैं।      


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