कभी अफसर रहे मिश्राजी के जलवे देख अब रिटायर होने के बाद भी सभी लोग कहा करते हैं कि उनका कद, फीते (मेजरिंग टेप) से बहुत बड़ा है। अपनी गृहवाटिका में टहलते हुए आज उन्होंने एक सब्जी बेचने वाले लड़के को हाथठेला खींचते और पीछे से एक औरत को धक्का देते हुए अपने गेट के सामने लगे पेड़ की छाया में पसीना पोंछते, सुस्ताते देखा। गेट की ओर जाने पर उन्हें वह लड़का अपनी भयग्रस्त चमकीली आंखों से इस आशा से देखने लगा कि शायद वह सब्जी खरीद लेंगे या यहाॅं से जाने को कहेंगे अतः बोला,
‘‘गुडमार्निंग अंकल’’
सब्जीवाले से अप्रत्याशित अंग्रेजी भाषा के अभिवादन से उत्साहित उन्होंने उससे पूछा,
‘‘ क्या नाम है तुम्हारा?’’
नीचे खिसक आए पेंट को ऊपर खींचकर बाहर झांक रहे अंडरवीयर को ढांकते हुए वह बोला,
‘‘सर! दीनू, मीन्स दीनानाथ।
’’पढ़ते हो?’’
‘‘यस सर। रीसेंटली, नाइंथ क्लास में प्रमोट हुआ हॅूं।’’
‘‘ये कौन है?’’
‘‘मदर।’’
इस वार्ता के दौरान मिश्राजी ने अनुभव किया कि लड़का बात तो बड़ी शालीनता से कर रहा है पर बार बार दायें बायें डरता सा देखता जा रहा है अतः पूछा,
‘‘क्या बात है, डर क्यों रहे हो?’’
‘‘ सर! बात ये है कि सब्जीवालों को 11 बजे तक ही सब्जी बेचना एलाउड है इसके बाद लाकडाउन लग जाएगा, फिर पुलिसवाले परेशान करते हैं, मदर की भी इंसल्ट करते हैं जो मुझे अच्छा नही लगता।’’
मिश्राजी ने जरूरत न होते हुए भी उससे सब्जी देने को कहा। उसने अपने हिसाब से अच्छी अच्छी छांट कर साठ रुपये की सब्जी दे दी। रुपए पाकर कृतज्ञता दर्शाती लड़के की चमकती आंखे जल्दी ही आगे बढ़ने का संकेत करने लगीं। मिश्राजी ने सब्जी ले जाने के लिए पत्नी को आवाज दी,
‘‘स्कूटी की सीट पर रखी सब्जी की थैली ले जाओ।’’
देखते ही पत्नी बरसने लगीं, ‘‘ ये क्या! बासी और सड़ी सब्जी लेकर साठ रुपये बेकार नाश कर डाले!’’ कुछ आगे कहतीं कि अचानक स्कूटी बोल पड़ी,
‘‘मेडम! ऐसे तो अनेक साठ रुपये आपने केवल अगरबत्ती, माचिस या मोमबत्ती खरीदने जाने के लिए पैट्रोल में ही फूंक दिए हैं, ये साठ रुपए तो बेचारे की आजीविका में सहायक ही होंगे न?...’’
तेजी से दूर जाते हुए उस लड़के को देख मिश्राजी को आज अपना कद फीते से बहुत छोटा लगा।
-त्रैलोक्यरंजन, सागर मप्र।
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