पढ़ाई में मन न लगने पर ‘लच्छू’ भी अपने पूर्वजों के धंधे, पशुपालन करने और दूध बेचकर परिवार का पालनपोषण करने में रम गये और नाम पड़ गया लच्छू बरेदी पर शौक हो गया पहलवानी का। हर साल नागपंचमी पर ‘लच्छू बरेदी‘ की कुश्ती देखने के लिये बच्चे, युवा और बूढ़े सभी उत्साह से आते और क्षेत्र के अन्य पहलवानों के साथ उसके पेंतरे देख सभी उसकी भूरिभूरि प्रशंसा करते रहते। जब आसपास के सभी पहलवान लच्छू बरेदी से हारने लगे तब उसके चर्चे दूर दूर तक होने लगे और अन्य स्थानों से भी प्रसिद्ध पहलवान और अनेक दर्शक लच्छू की कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने/ देखने आने लगे। एक बार नागपंचमी को जिला स्तर पर प्रस्तावित कुश्ती प्रतियोगिता का उद्घाटन करने और जीतने वाले पहलवानों को पुरस्कार प्रदान करने के लिये जिले के युवा ‘‘आइएएस’’ कलेक्टर को मुख्य अतिथि बनाया गया । कलेक्टर ने लच्छू की पेंतरेवाजी से प्रसन्न हो विशाल जन समूह के सामने अपनी ओर से पुरस्कार देते हुए कहा -
‘‘ लच्छू जी! आपके दावपेंच, फुर्ती और जोश की जितनी तारीफ की जाय कम है, इसे पाने के लिये आपने सचमुच बहुत दिनों तक कड़ा अभ्यास और पराक्रम किया होगा, मुझे तो यह ‘कलेक्टर’ की परीक्षा पास करने से भी कठिन लगता है ।’’
‘‘ बिलकुल साब! किया होगा नहीं, रोज ही करता हॅूं.... ‘कलेक्टर’ की परीक्षा पास करने के लिये तो अच्छी तरह पढ़ाई कर केवल एक बार ही परीक्षा पास करना होती है। परंतु पहलवान को तो रोज ही, एक सी मेहनत करने की परीक्षा पास करना होती है; जिसदिन मेहनत नहीं कर पाते, लगता है पहलवान नहीं हॅूं।’’
No comments:
Post a Comment