‘‘ राजू! जरा संडे का पेपर ढूंड कर देना, उसमें मेरी कथा छपी है।’’
‘‘ लीजिये पापा, इसमें तो मुझे नहीं दिखी! किसी और दूसरे दिन का तो नहीं चाहिये?’’
‘‘ अरे नहीं भाई! इसी का सातवाॅं पृष्ठ देखो, कहाॅं है,?
‘‘ सातवाॅं पृष्ठ तो. . . इसमें नहीं है शायद मम्मी ने. . . ’’
‘‘ क्यों ! ! इस पेपर का सातवाॅं पृष्ठ कहाॅं है? मुझे उसकी जरूरत है।’’
‘‘ अरे उस दिन पिंटू ने फर्श पर ही पाॅटी कर ली थी ना , सो शायद उसी को फाड़ कर सफाई कर फेक दिया होगा"
‘‘ अरे मूर्ख! तुझे भी पाॅटी को साफ करने के लिये वही पृष्ठ मिला? उसमें मेरी कथा छपी थी और तुमने उसी को. . .?
‘‘ हाॅं, उसमें एक ओर तो विज्ञापन थे और दूसरी ओर कुछ बेकार टाइप की न्यूज, इन पेजों को कोई सम्हालकर रखता है क्या?’’
‘‘ अरे तुमने कभी साहित्य पढ़ा, समझा होता तो लघुकथा का महत्व जान पातीं, मगर ओह! तुमने तो गुड़ गोबर एक कर दिया?’’
‘‘ जानती हॅूं, तुम्हारी लघुकथायें किसी को समझ में तक आती नहीं हैं, सभी लोग मजाक उड़ाते हैं फिर भी दिन रात उन्हीं में अपना समय और दिमाग खराब करते रहते हो? फेक दिया तो फेक दिया, रद्दी कागज ही तो था?’’
‘‘ तुम क्या जानो? . . उत्तम लघुकथा वही है जो किसी की समझ में आये या नहीं परंतु बार बार पढ़ना अवश्य चाहे।’’
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