‘‘ यार! ये लड़के हैं या लड़कियाॅं? पोशाक से तो समझ में नहीं आता. . ।’’
‘‘ हाॅं , यह आज कल का फैशन है इसमें महिला और पुरुष के भेदभाव को समाप्त कर दिया गया है भले ही वह केवल कपड़ों तक ही सीमित हो’’
‘‘ क्या मतलब?’’
‘‘मतलब यह है कि पोशाक बदलकर वे अपने को साहसी और सुरक्षित होने का अनुभव करतीं हैं परंतु मनोभावनायें वही पुरानी रहती हैं क्योंकि वह तो प्रकृति पदत्त हैं’’
‘‘बात तो मार्के की है यार! पर वे भी हिमालय की चोटी पर चढ़ लेती हैं, सेना में फायटिंग कर लेती हैं, वायुयान तक उड़ा लेती हैं’’
‘‘ हाॅं, परंतु केंचुआ, काकरोच और छिपकुली से अभी भी डरती हैं।’’
‘‘ तुम्हारी बातों को सुनकर मुझे चालीस साल पहले गंगासागर यात्रा में मिले महामहोपाद्याय गंगानन्द जी की भविष्यवाणी याद आ गयी’’
‘‘ क्या?’’
‘‘ उनका कहना था कि पुरुषों ने महिलाओं को हजारों वर्ष अपना गुलाम बनाये रखकर अनेक प्रकार के अत्याचार किये हैं, सामाजिक स्तर पर उन्हें बराबरी का स्थान न देकर दूसरा दर्जा ही दिया है, इसलिये अब उनके मन में जमी प्रतिशोध की भावना एक दिन जागेगी और प्रकृति भी उनका साथ देगी। सभी महिलायें पुरुष और सभी पुरुष महिलाओं में रूपान्तरित हो जायेंगे! ! !’’
" अरे अच्छा याद दिलाया, अभी कुंभ मेले में मिले स्वामी विचित्रानन्द जी तो यह रहे थे कि अगले पाॅच सौ सालों में विश्व के महिला और पुरुषों में पारिवारिक संबंध शून्य होकर परस्पर जिम्मेदारी की भावनायें ही समाप्त हो जायेंगी, लिव इन रिलेशन, लेसवियन रिलेशन, और गे रिलेशन की भरमार होगी। सभी आदिमानवों की तरह लिवरटाइन हो जायेंगे।’’
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