‘‘कृपानन्द!. . .कृपानन्द !!. . .’’
‘‘आया गुरुदेव, आया . . .आ हा! अवश्य मेरे अनेक जन्मों के पुण्य प्रकट हुए, आप मेरे घर पधारे... साष्टाॅंग दण्डवत् प्रणाम करता हॅूं गुरुदेव। आइये आसन ग्रहण कीजिये।’’
‘‘ कृपानन्द! मैं यहाॅं बैठने नहीं आया हॅूं, तुमसे कुछ प्रश्न पूछने आया हॅूं।’’
‘‘ अवश्य पूछिये भगवन्, ’’
‘‘ तुम एक पिता हो, अपनी संतान से क्या अपेक्षा करते हो?’’
‘‘ महाराज! जैसे सभी माता पिता अपनी संतान से अपेक्षा करते हैं, यही कि वे चतुर्दिक उन्नति करें और जीवन में अपने पिता से भी अधिक ऊंचे कीर्तिमान स्थापित करें’’
‘‘ बहुत अच्छा, कृपानन्द! तुम एक गुरु भी हो , तुम अपने शिष्यों से क्या अपेक्षा रखते हो?‘‘
‘‘ प्रभो! यही कि वे अपने गुरु के ज्ञान को प्रचारित कर उसमें अपने पराक्रम से अनेक गुना बृद्धि करें और गुरुत्व के स्तर को और ऊंचा करने में जुटे रहें।’’
‘‘ लेकिन मुझे अन्तः ज्ञान हुआ है कि तुमने अपने एक मेधावी शिष्य के द्वारा पूछे गये परिप्रश्नों का उचित समाधान न कर, उन्हें प्रतिष्ठा का बिंदु बना लिया, तुम्हें लगा कि यह तो तुम्हारे ज्ञान के स्तर से भी अधिक आगे निकल रहा है इसलिये तुमने उसे हतोत्साहित कर अपमानित भी किया ? आखिर क्यो?’’
‘‘ नहीं गुरुदेव! मेरा यह मतलब कदापि नहीं था’’
‘‘ असत्य बोलकर क्या तुम मेरे अन्तः ज्ञान की परीक्षा ले रहे हो?’’
‘‘नहीं महाराज! बिलकुल नहीं ! ! दर्पान्धकार ने मुझे घेर लिया था’’
‘‘ तो प्रायश्चित स्वरूप दण्ड का निर्धारण स्वयं करोगे या मुझे ही निर्धारित करना पड़ेगा?’’
‘‘हे करुणानिधान ! आपका निर्धारण ही मुझे प्रसाद स्वरूप है’’
तो सुनो . . अब तुम्हें अपने ज्ञान स्तर के, कम से कम पचास शिष्य और तैयार करना होंगे? इन शिष्यों को एक वर्ष बाद मुझसे शास्त्रार्थ करना होगा यदि शास्त्रार्थ में एक भी शिष्य कमजोर पाया गया तो पुनः पचास नये शिष्य इसी स्तर के तैयार करना होग, समझेे
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