Sunday, September 13, 2020

104 गृहस्थ सन्त

 

रामनाथ जी अपने क्षेत्र के विद्वानों में अग्रगण्य थे। सहजता, सात्विकता, और आध्यात्मिकता उनके आभूषण थे तथा ज्ञान, कर्म और भक्ति उनके अंगवस्त्र ।  सौभाग्यवश उनकी सहधर्मिणी भी उन्हीं के स्वभाव की ही थीं। 

उसी क्षेत्र के एक धन सम्पन्न सज्जन को पूर्व जन्म के किसी सुसंस्कारवश विचार आया कि किसी सुपात्र और सात्विक धर्मपारायण व्यक्ति की तलाश कर अपने धन का कुछ भाग उन्हें देकर पुण्य लाभ लिया जाय। अपने सहयोगियों से परामर्श लेने पर उन्होंने पाया कि पंडित रामनाथ जी से श्रेष्ठ और योग्य अन्य कोई नहीं है जिन्हें वे अपना धन देकर कृतार्थ हो सकते हैं। उन्होंने रामनाथ जी के पास जाकर निवेदन किया-

‘‘ महोदय! क्या आपकी कोई समस्या है, हो तो बतायें , मुझे उसका समाधान करने में प्रसन्नता होगी’’

‘‘ हाॅं! कुछ देर पहले एक श्लोक का अर्थ कुछ परेशान कर रहा था, पर अब सब ठीक है, अब कोई समस्या नहीं है’’

‘‘ अरे महात्मन्! मैं उस समस्या की नहीं, घर गृहस्थी में किसी वस्तु या धन की आवश्यकता की बात कर रहा था’’

‘‘ अरे... घर गृहस्थी के संबंध में तो मेरी धर्मपत्नी ही बता सकती हैं, उन्हीं से पूछ लीजिये’’

‘‘ माता! आपको अपने घर गृहस्थी के संचालन में यदि किसी चीज की कमी हो तो आदेश करें’’

‘‘ आज तो दाल और चावल पर्याप्त है, हाॅं, आटा भी है और... उनके पसंद की आम की चटनी का भी प्रबंध हो गया है, लगता है किसी भी चीज की कमी नहीं है, सब कुछ है, धन्यवाद।’’

 अपने धन का दर्प समेटे सज्जन, चुपचाप वापस चले गये।


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