Friday, September 18, 2020

132 गोत्र

 ‘‘ पाठक जी ! तुम तो जगह जगह यात्रा करते रहते हो, ‘अनु’ अब बड़ी हो गई है, उसके लायक कोई योग्य लड़का हो तो जरा ध्यान रखना ।’’

‘‘ हाॅं, परन्तु यह बताओ कि लड़का किस प्रकार का चाहते हो, अर्थात् प्राइवेट नौकरीवाला, धंधेवाला, देशी या विदेशी ?’’

‘‘ सरकारी नौकरीवाला हो तो उत्तम, वैसे अच्छे खानदान के आत्मनिर्भर लड़के पर भी विचार कर सकते हैं।’’

‘‘लड़का तो मेरी नालेज में है शर्मा जी का, परन्तु अभी तो विदेश में किसी ट्रेनिंग को पूरी करने गया है।’’

‘ तो पता करो कब तक लौटेगा, खानदान, गोत्र, कुंडली आदि का पता कर बताना’’

मिश्र जी ! आप भी गोत्र, सूत्र, कुंडली में उलझे है? लड़का देखोगे तो फिर ये सब कुछ भूल जाओगे’’

‘‘लेकिन फिर भी गोत्र तो ... ’’

‘‘ यदि मेरी बात बुरी न लगे तो सुनो, एन्थ्रोपोलाजी के अनुसार हम सभी का गोत्र तो ‘एप’ अर्थात् बन्दर हैं, फिर चाहे वे शाॅंडिल्य हों या कश्यप हों या भरद्वाज । इस ‘गोत्र’ को क्यों बीच में लाते हो? मैं तो ज्ञान, सुसंस्कार, सदव्यवहार और आत्मनिर्भता को ही जानने की सलाह दूॅंगा ।’’

‘‘ अरे पाठकजी ! ‘शर्मा’ तो अब सभी लिखने लगे हैं, आखिर जाति का भी तो ... ’’

‘‘ तो आपका मतलब यही  हुआ न कि वे ‘‘बन्दर ब्राह्मण हैं या बन्दर क्षत्रिय या बन्दर वैश्य, या बंदर शूद्र ? अरे ! बन्दरों में कोई जाति होती है? यह तो हमने जबरदस्ती ओढ़ कर ऊॅंचनीच के रंग में रंग ली हैं। ’’

‘‘ आपके ये सब कथन तो लेखों और भाषणों के लिये ही उत्तम हैं, आचरण में लाकर देखना तब समझ में आयेगा ! पर उपदेश.. .. । ’’

‘‘ भाई साब! समाज बहुत आगे जा चुका है, हमको तब समझ में आयेगा जब हमारे बच्चे अपनी मर्जी से गृहस्थी बसा कर हमसे से दूर होते जायेंगे।’’


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