कल डाॅ साक्षी के घर आयोजित पारिवारिक कार्यक्रम में गोरखपुर से पधारे प्रोफेसर नेगी से मेरा परिचय कराते हुए वह बोले,
‘‘आपसे मिलिये, आप हैं त्रैलोक्यरन्जन जी, हमारे अभिन्न मित्र और योग विज्ञान के प्रसिद्ध लेखक।’’
‘‘ त्रैलोक्यरन्जन! नाम कुछ जाना पहचाना सा लगता है, क्या आप फेसबुक पर भी लिखा करते हैं ?’’ प्रोफेसर नेगी कुछ सोचते हुए बोले ।
‘‘ जी हाॅं, वही ।’’
‘‘ अरे साहब! आपकी लेखनी ने तो बड़े बड़े शोधकर्ताओं को भी हिला दिया है, आध्यात्म पर आपकी वैज्ञानिक और व्यावहारिक व्याख्याओं से ये लोग वर्षों पुरानी स्थापित मान्यतायें भी बदलते देखे जा रहे हैं। ’’
‘‘ प्रोफेसर नेगी ! आपको इनके बारे में केवल इतना ही मालूम है ? ये ज्ञान विज्ञान में ही नहीं साहित्य में भी अपने अचूक तीर चलाते रहते हैं।’’ डाॅ साक्षी ने पुट मिलाया।
‘‘ हः हः हः हः .. .. ..’’
‘‘ आप हॅस रहे हैं त्रैलोक्यरन्जन जी !’’ प्रोफेसर नेगी बोले।
‘‘ आप जैसे विद्वानों के द्वारा मेरे प्रयत्न को मान्यता मिलना सचमुच उत्साहवर्धक है, परन्तु मैं अपने को अभी अधूरा शिक्षक ही मानता हॅूं।’’
‘‘ लेकिन अधूरा क्यों ?’’
‘‘ प्रोफेसर साहब ! आध्यात्मिक तथ्यों पर मेरी व्याख्याओं को चाहे सारा विश्व ही क्यों न मान्यता दे दे, परन्तु मेरी धर्मपत्नी को समझाते हुए व्यालीस साल बीत जाने के बाद भी उसे सहमत करा पाने में, मैं हर बार असफल ही रहता हॅूं।’’
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