134 गोमती
जागीरदार पिता के बिगड़ैल लड़के का गाॅंव के ही कहार की लड़की ‘गोमती’ पर ऐसा दिल आया कि उसे अर्धांगिनी ही बना लिया। पिता को पता चला तो दोनों को घर से ही नहीं अपनी जागीर से भी बाहर कर दिया। जागीरदार का बेटा मजदूरी कैसे करता, आलस्य और लिप्सा में ही डूबा रहता। बेचारी गोमती ही गाॅंव के कुछ सम्पन्न घरों में, अपना पैत्रिक काम, कुए से पानी भरकर लाने का, करके परिवार पालने लगी ।
एक दिन, एक जीर्णशीर्ण भिखारी सम्पन्न घर देख वहाॅं कुछ पाने की इच्छा से बड़ी देर तक खड़ा रहा। इस बीच गोमती तीन बार पास के कुए से पानी भर कर ला चुकी । हर बार भिखारी देखता कि गोमती सिर पर एक के ऊपर एक रखे पानी से भरे दो घड़े बायें हाथ से सम्हालती और एक छोटे बच्चे को दायीं ओर कमर पर हाॅथ के सहारे पकड़े चलती जाती और दूसरा बड़ा बच्चा उसकी साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे पीछे चलता जाता।
अगली बार पानी भरने जाते समय बच्चे भूख से रोने लगे। पास में बने पत्थर के चबूतरे पर अपनी लाठी ठोककर भिखारी बोला,
‘‘ तू तो रोज ही यह दृश्य देखता है, कैसा लगता है?’’
चबूतरा बोला, ‘‘ मैं तो पत्थर का हॅूं, तेरी तरह मेरे हाथ पैर होते तो चल फिर कर मैं इसे कुछ मदद करने की सोचता।’’ भिखारी निराशा भरी साँस लेकर बोला,
‘‘ अरे ! ! मेरे पास धन होता तो सबको बाॅंट देता न कोई भिखारी होता और न मजदूर ।’’
यह सुनकर रोते बच्चों को चलते चलते सम्हालती, गोमती बोली,
‘‘ कभी मैं ने भी ऐसे ही सपने देखे थे परन्तु यह भूल गयी थी कि कर्मफल तो खुद को ही भोगना पड़ता है, उससे कैसे बचा जा सकता है?’’
और, रास्ते में पड़ने वाले अपने घर रुककर छोटे बच्चे को दूध पिलाकर रात की बची दो रोटियों में से एक आंगन में खड़े दूसरे बच्चे को देते हुए दूसरी रोटी खुद खाने के लिये वहीं बैठी ही थी कि इतने में वह भिखारी भी धीरे धीरे उसके घर आ पहॅुंचा। गोमती ने अपनी रोटी उस भिखारी को देते हुए घड़े और छोटे बच्चे को उठाया और कुए की ओर चल दी। बच्चा रोटी खाते हुए पीछे पीछे उछलता कूदता जा रहा था और भिखारी कृतज्ञता के आँसुओं से भिगो कर वह रोटी खाते खाते बुदबुदा रहा था,
‘‘ धनी लोगों में गरीबों की तरह उदार हृदय नहीं होता ।’’
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