सेना से रिटायर होने के बाद, एक अरब़पति सेठ के यहाॅं कार्यरत सीक्योरिटी मेनेजर विक्रमसिंह, अनेक वर्ष बाद अवकाश लेकर बाल्यावस्था के मित्रों से मिलने अपने गाँव आ पहँुचे। खबर मिलते हीे मिलने आये सभी लोग उन्हें घेरकर बैठ गये। कोई उनसे सेना की बहादुरी के किस्से पूछ रहा था तो कोई वर्तमान में किये जाने वाले कार्य के बारे में।
अपने सेठ की सम्पन्नता के बारे में विक्रमंिसंह बता रहे थे कि किस प्रकार उसके यहाॅं सैकड़ों लोग फैक्टरी में काम करते हैं। बंगले पर सुरक्षा, सफाई, बगीचे की देखभाल के लिये, पालतु कुत्तों, बिल्लियों के लिये नौकर कितने कितने हैं। गाड़ियों के ड्राइवर कितने हैं। भोजन तैयार करने वाले रसोइया कितने हैं, आदि आदि ।
यह सुनते ही विक्रम के एक साथी ने पूछा ‘‘ तुम्हारा सेठ भोजन भी अपने हाथ से करता है या इसके लिये भी नौकर लगाए गए हैं?’’
‘‘ हः हः हः, नहीं, भोजन तो अपनेे आप ही करता है, परन्तु बहुत कम। बस, कुछ फल फूल दवाइयाॅं और दाल रोटी।’’ बिक्रम ने जबाब दिया।
‘‘ विक्रम! तुम्हारा सेठ बड़ा निरीह है, दूसरों पर ही निर्भर है बेचारा। हमें तो उस पर बड़ी दया आती है।’’ एक बुजुर्ग अचानक बोल पड़े।
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