इमारती लकड़ी खरीदने की सलाह लेने, एक दिन मैं टिम्बर मर्चेंट सरदार अवतारसिंह के घर पहुॅंचा। उनके छोटे छोटे बच्चे, मेरे पहुँचने से पहले धमाचैकड़ी मचाते हुए उनसे कहानी सुनाने की रट लगाये थे। सरदारजी चारपाई पर लेटे, बड़े ही सोच विचार में पड़े थे कि इन्हें क्या सुनाऊँ। अचानक सरदारजी बोले,
‘आओ जी ! त्वानु मापारत दी कांणी सुणावां। ’’
बच्चे झटपट चारपाई पर उनसे सट कर बैठ गए।
‘‘हाँ जी! तुसीं मापारत दा नम सुणा, जा नईं ?’’ बच्चे कोई हाँ जी बोले कोई न।
‘‘चंगा जी , तँ... मापारत विचों सी... पंज पंडवा। किन्ने जी ? ’’
‘‘पंज।’’
‘‘हाँ जी ! ता... उना विचों सब तों बड्डा सी दित्तर, ते दूजा बड्डा तकड़ा सी पिम्म। हैं जी ! ते इक होर... , इक होर..... , ता... इक दा नम मैं पुल गिया जी। ’’
इस पर बड़ा बच्चा बोला,
‘‘पापाजी! तुसी पंज विचों दो नम ही दस्से हन, कहिन्दे हो इक दा नम पुल गिया ? ’’
‘‘ओ पुत्तर! मैं कोई पड्या वड्या नईं ना इसलै पुलता वां ’’ सरदारजी बड़े दुखी हो बोले।
इसी बीच एक बच्चे ने गेट के पास मुझे देख कर उन्हें ध्यान दिलाया, वे जल्दी उठे और ‘सत्श्रीअकाल जी’ कहते हुए अन्दर आने का इशारा किया। पहुॅंचते ही उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से, बच्चों को महाभारत की कहानी सुनाने का निवेदन किया। मैं अपनी कहानी बाद में, पहले महाभारत की कहानी सुनाने लगा। सुनते सुनते सरदारजी बच्चों की तरह बड़े ही तल्लीन दिखे।
मैं ने पूछा, ‘‘ सरदारजी ! कि होया? कहानी तो खत्म हो गई।’’
जैसे किसी ने सोते से जगा दिया हो, वे बोले
‘‘ ओ जी! मै साठ साल पिछों चला गिया सी जदों देश दा बटवारा होया, अपणे परिवार दे नाल लाहौर तों दिल्ली आणे दी धुंधली यादों, माॅंप्यो तों विछुड़ना, स्कूल छूटना, भूखे प्यासे अनेक जगह भटकना आदि सोचने में खो गिया जी! पर, त्वानु बहुत तनवाद जी! काश! मैनु भी पढ़ने दा मौका मिल पाया हुंदा तद अज, इन बच्चयानु मेरी ओर तों इन्नी निराशा न हुंदी ! ’’
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