Friday, September 18, 2020

130 उपकार

 

जैसे तैसे मुख्य सड़क से गाॅंव तक चार किलोमीटर लम्बा पहुॅंच मार्ग बन ही गया । ग्रामवासी विधायक के गुणगान करते न थकते। उन्हें लगता कि उनके दुखदर्द को समझने वाला कोई है तो वह है विधायक। बच्चे बूढ़े सभी कृतकृत्य थे कि अब गाॅंव के दिन फिरे, उन्हें बरसात में कीचड़ में से नहीं चलना पड़ेगा। पहुंच मार्ग के दोनों ओर लगे पेड़ों पर और बीच बीच में लोहे के खभों पर तीन बाई दो फुट की लोहे की तख्तियों पर बड़े बडे़ अक्षरों में लिखाया गया था -

 ‘‘यह पहुॅंच मार्ग माननीय विधायक ‘कखग’ द्वारा, विधायक निधि से बनावाया गया ।’’

बरसात आई । पानी भी भगवान ने अपनी इच्छा से बरसाया। मार्ग कुछ ही दिनों में अपने इतने विकृत रूप में आ गया कि गड्ढे ही गड्ढे दिखने लगे और पैदल चलना भी दूभर हो गया। लोग निर्माता को कोसने लगे। एक दिन गाॅंव के किसी छात्र ने स्कूल में शिक्षक से पूछा,

‘‘ सर! यह विधायक निधि क्या होती है, क्या यह राशि उनकी स्वयं की होती है?’’

‘‘ नहीं ! यह तो जनता द्वारा सरकार को दिये जाने वाले टैक्स का पैसा ही होता है जो अलग अलग विकास के कामों के लिये विधायकों और साॅंसदों के माध्यम से सरकार खर्च कराती है।’’ 

‘‘ तो क्या ये लोग इसमें अपना कुछ भी खर्च नहीं करते ?’’

‘‘नहीं, यदि उनके जेब से लगता होता तो तुम्हारे गाॅंव की अभी अभी बनी सड़क इतने जल्दी मिट जाती ?’’

‘‘ अच्छा अब समझ में आया’’

अब, गाॅंव के बच्चे उस रोड पर आते जाते विधायक के द्वारा लगाई गयी उन तख्तियों पर पाॅंच पाॅंच पत्थर मारने लगे। अब वे तख्तियाॅं भी रोड की तरह ही विकृत हो चली। एक दिन किसी बुजुर्ग ने बच्चों को तख्तियों पर पत्थर मारने से रोका । बच्चे बोले,

‘‘ दादा ! यह विधायक चोर है, यह हमारे गाॅंव के बोटों से चुना गया और फिर भी इसने हमारे ही टैक्स के पैसों से थर्डक्लास रोड बनवाया। इतना ही नहीं, अपना नाम जगह जगह लिखवा कर अपने को परोपकारी कहता है। यदि अब वह गाॅंव में आयेगा तो उसका स्वागत भी हम इसी प्रकार करेंगे।’’

बुजुर्ग बोले, ‘‘भैया! लेकिन, इसमें विधायक का क्या दोष है, यह तो ठेकेदार की गलती है’’

‘‘ दादा ! ठेकेदार ‘अ ब स’ भी तो विधायक के ही मौसेरे भाई हैं कि नहीं? आने दो गाॅंव में, सबका इसी प्रकार ही स्वागत करेंगे, हमें बिलकुल न रोकना ।’’


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