वर्षों की प्रतीक्षा और प्रयास के बाद अन्ततः एक गाॅंव में सरकार ने स्कूल भवन बनवा ही दिया। छात्रों और अभिभावकों को लगने लगा कि अब नये सत्र में नये भवन में पढ़ाई होने लगेगी। वर्षा के साथ फिर से नया सत्र आया लेकिन छात्र उसी पुरानी और पानी टपकते छप्पर वाली बिल्डिंग में बैठने को विवश थे क्योंकि पिछले सात आठ माह से कोई नेता स्कूल के उद्घाटन का समय ही नहीं निकाल पा रहा था। गाॅंव के लोगों और शिक्षकों ने सरपंच से कहा कि बच्चे बरसात में परेशान हो रहे हैं, पढ़ाई नहीं हो पा रही है, जब तब छुट्टी करना पड़ती है, इसलिये स्कूल का ताला खोलकर बच्चों को वहाॅं बैठकर पढ़ने दो। पर सरपंच भी थे गजब के अड़ियल। हरबार कहते बस मंत्री जी से उद्घाटन करा लेंने दो फिर तो बच्चों का ही स्कूल है। एक दिन जोर से पानी बरसा छात्र छात्रायें परेशान हो यहाॅं वहाॅं छिपने लगे, स्कूल के हेडमास्टर को यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने नये भवन में सरपंच द्वारा लगाया गया ताला तोड़ कर छात्रों की कक्षायें वहाॅं लगाना प्रारम्भ कर दी।
हेडमास्टर की इस कार्यवाही ने सरपंच के अहंकार को इतनी चोट पहॅुचाई कि उसने थाने में रिपोर्ट कर दी और प्रकरण कोर्ट में जा पहुॅंचा। कोर्ट में जज के सामने अभियोजन पक्ष के बकील ने हेडमास्टर पर स्कूल का ताला तोड़ने के अपराध में दंडित करने की माॅंग की। जज ने बचाव पक्ष के बकील को बुलाया।
‘‘ सर! मैं अपना पक्ष स्वयं रखूॅंगा, मेरा कोई बकील नहीं है’’ हेडमास्टर बोले ।
‘‘ अच्छा, बोलो, आप अपने बचाव में क्या कहना चाहते हैं?’’ जज ने पूछा।
‘‘ सर! मुझे बताया जाय कि स्कूल का भवन निर्मित हो जाने के बाद, कानून की वह कौन सी धारा है जिसके अनुसार यह प्रतिबंध लगाया गया हो कि जब तक किसी मंत्री या नेता से उद्घाटन न करा लिया जाय उसमें कक्षायें प्रारंभ न की जायें। जिसके उल्लंघन के लिये मैं दोषी बनाया गया हॅूं वह कौन सी धारा है? सर! यदि कोई इस प्रकार की धारा है तो उसमें मंत्री या नेता को कितने समय के भीतर उद्घाटन कर देने का निर्धारण किया गया है?’’ हेडमास्टर ने पूरा विवरण आद्योपान्त देते हुए कहा ।
जज ने अभियोजन पक्ष के बकील की ओर देखते हुए उत्तर की अपेक्षा की,
‘‘ सर! कानून में इस प्रकार की कोई धारायें नहीं हैं, परन्तु सभ्यता और मानवीयता का तकाजा है कि कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने के पहले किसी जनप्रतिनिधि को बुलाया जाना चाहिये’’
जज ने हेडमास्टर की ओर देखा,
‘‘ सर! परिस्थितियाॅं पहले ही आपके सामने स्पष्ट कर दी गयी हैं, आखिर जनप्रतिनिधियों के लिये जनता के प्रति कोई मानवीयता का तकाजा है या नहीं ? स्कूल भवन का ताला खोलकर उसमें कक्षायें लगाने में मेरा कोई अपराध नहीं है। ’’
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