स्टेशन रोड के किनारे बने ढाबेनुमा टपरे से लगे एक खंडहर की दीवार के पास बैठे आठ दस भिखारियों को ढावे के मालिक का नौकर बचे हुए जूंठन को एकत्रित कर उन्हें क्रमशः बाॅंटते हुए कहता है,
‘‘ हाॅं! बता कितने हैं?‘‘
‘‘ चार‘‘
‘‘ अच्छा, ले कटोरे में दाल, चावल‘‘
‘‘चल तू बता रे! आज क्या फिर खाली है?‘‘
‘‘ नहीं मालिक! दो ही मिले हैं‘‘
‘‘ देख बहुत उधारी अच्छी नहीं, समझा?‘‘
‘‘ सब चुका दूंगा साब! आज तो रोटी दे दो‘‘
‘‘ ले तू रोटी, पर कल से नहीं मिलेगी, उधारी चुकाना होगी पहले ‘‘
‘‘अबे! तू उधर क्या देख रहा है, मिला कुछ कि नहीं?‘‘
‘‘ एक रुपया ही है साब!‘‘
‘‘ साले! दिनरात दो कट्टा बीड़ी पीने को दस रुपये खर्च करता है पर खाने के लिये एक रुपया दिखाता है, आज तो ले ले पर कल से नहीं आना‘‘
‘‘ ओ किनारे पर लेटे लाटसाहब! तुम्हें क्या अलग से निमंत्रित करना पड़ेगा, गर्मी में कथरी ओढ़े कल से डले हो, तुम्हें चाहिये कुछ ?‘‘
‘‘ नहीं ‘‘ (धीमें से बोला)
‘‘अरे! क्या मर गया? जोर से नहीं बोल सकता?‘‘
‘‘ कह दिया न!!! कोई जरूरत नहीं !!!‘‘ (अपनी रही सही ताकत जुटा कर जोर से बोला)
‘‘अरे, छोड़ो साब! मुझे दे दो, वह तो कहता है कि लंघन करने से ज्वर के कष्टों से ही नहीं, कष्टदायी इस जीवन से भी छुटकारा मिल जाता है, इसीलिये वह लंघन कर रहा है।‘‘
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