Tuesday, September 15, 2020

112 लंघन


स्टेशन रोड के किनारे बने ढाबेनुमा टपरे से लगे एक खंडहर की दीवार  के पास बैठे आठ दस भिखारियों को ढावे के मालिक का नौकर बचे हुए जूंठन को एकत्रित कर उन्हें क्रमशः बाॅंटते हुए कहता है,

‘‘ हाॅं! बता कितने हैं?‘‘

‘‘ चार‘‘

‘‘ अच्छा, ले कटोरे में दाल, चावल‘‘

‘‘चल तू   बता रे! आज क्या फिर खाली है?‘‘

‘‘ नहीं मालिक! दो ही मिले हैं‘‘

‘‘ देख बहुत उधारी अच्छी नहीं, समझा?‘‘

‘‘ सब चुका दूंगा साब! आज तो रोटी दे दो‘‘

‘‘ ले तू रोटी, पर कल से नहीं मिलेगी, उधारी चुकाना होगी पहले ‘‘

‘‘अबे!  तू  उधर क्या देख रहा है, मिला कुछ कि नहीं?‘‘

‘‘ एक रुपया ही है साब!‘‘

‘‘ साले! दिनरात दो कट्टा बीड़ी पीने को दस रुपये खर्च करता है पर खाने के लिये एक रुपया दिखाता है, आज तो ले ले पर कल से नहीं आना‘‘

‘‘ ओ किनारे पर लेटे लाटसाहब! तुम्हें क्या अलग से निमंत्रित करना पड़ेगा, गर्मी में कथरी ओढ़े कल से डले हो, तुम्हें चाहिये कुछ ?‘‘

‘‘ नहीं ‘‘ (धीमें से बोला)

‘‘अरे! क्या मर गया? जोर से नहीं बोल सकता?‘‘

‘‘ कह दिया न!!! कोई जरूरत नहीं !!!‘‘ (अपनी रही सही ताकत जुटा कर जोर से बोला)

‘अबे! गरजता क्यों है?‘‘ 

‘‘अरे, छोड़ो साब! मुझे दे दो, वह तो कहता है कि लंघन करने से ज्वर के कष्टों से ही नहीं, कष्टदायी इस जीवन से भी छुटकारा मिल जाता है, इसीलिये वह लंघन कर रहा है।‘‘


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