‘‘रमेश! कालेज से लौटते समय तुम सिविल लाइन में पाॅंडे जी और उन्हीं के बगल में रहने वाले तिवारी जी को कल दोपहर में अपने घर पर भोजन करने का सपरिवार निमंत्रण देते आना। वहाॅं से आगे जाकर गौघाट पर रहने वाले गुप्ताजी और खरे साब को भी कहते हुए घर आ जाना। मैं शाम को घूमने जाते समय चतुर्वेदी जी से कह दूंगा। कल तुम्हारी माॅं की बरसी है, ग्यारह ब्राह्मणों का भोजन कराना है।’’
‘‘ लेकिन पापा! मैं तो कल केमिस्ट्री प्रेक्टीकल क्लास से देर में ही छूट पाऊंगा, सभी जगह कैसे जा पाऊंगा? अतः कुछ लोगों को फोन से कहे देते है।‘‘
‘‘ तुम अपनी अकल क्यों लगाते हो? निमंत्रण घर पर जाकर ही दिया जाता है यही परंपरा है। ’’
‘‘ यदि ब्राह्मणों को ही भोजन कराने की परम्परा है तो गुप्ता और खरे अंकल को आमंत्रित करने की क्या आवश्यकता, यह तो परंपरा का पालन नहीं हुआ? और यदि यह उचित है तो उन्हें भोजन क्यों कराया जाय जो रोज दिन में चार बार खाते हैं, मेरे विचार से तो भोजन भूखे लोगों को ही कराया जाना चाहिये चाहे वे कोई भी हो।’’
‘‘ तुमने कालेज की चार किताबें क्या पढ़ ली सभी परंपराओं को तोड़ने और संस्कारों की होली जलाने को ही उत्सुक रहने लगे हो? जैसा कहा है वैसा ही करना, समझे?’’
‘‘ पापा! मेरी यह समझ में नहीं आता कि आप लोग परंपरा के नाम पर अवैज्ञानिक, अतार्किक और अविवेकपूर्ण पृथाओं को क्यों पाले रहना चाहते हैं । क्या आप बता सकते हैं कि सभी के पूर्वज धोती कुर्ता पहना करते थे तो उसे छोड़कर अब पेंट शर्ट क्यों पहिनते हैं? बैलगाड़ी को छोड़ कर कार, रेल और एरोप्लेन में क्यों यात्रा करते हैं? इसी प्रकार यदि परम्परायें अवैज्ञानिक और अतार्किक आधार पर बनी हों तो उनको त्यागना क्या उचित न होगा? परंपरा के नाम पर तथ्यों की अव्यावहारिक और मनमानी व्याख्या करना क्या मानसिक बीमारी नहीं है ? ’’
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