Wednesday, September 16, 2020

122 समझ का फेर

 

पृथक बुंदेलखंड बनाने के लिये बहुत उत्साहित एक स्थानीय नेता ने अपने अन्य साथियों के सहयोग से  एक बड़े से गाॅंव में रेली का आयोजन किया जो अन्त में  सभा के रूप में बदल गयी। गाॅंव के अधिकांश बुजुर्ग, युवा और बच्चे उपस्थित थे । औपचारिकता के लिये भीड़ में से एक बुुजुर्ग को आदर पूर्वक मंच का सभापतित्व सौपकर नेता जी अपने तर्को को उपस्थित भीड़ में रखने लगे। श्रोता गण सहमति में अपने अपने सिर हिलाकर संकेत दे रहे थे। भीड़ को अपने भाषण से सम्मोहित समझ नेता जी ने अन्त में उनके साथ यह नारा लगाने के लिये कहा.

 ‘‘ बुंदेलखंड के लिये जियेंगे, बुंदेलखंड के लिये मरेंगे’’

यह सुनते ही सभापति बुजुर्ग ने उठकर नेता जी से माइक झटका और बोले.

‘‘ ये बात ठीक है कि बुंदेल खंड के लिये जियेंगे, पर ये क्या बात हुई कि बुंदेलखंड के लिये मरेंगे? अरे ! हम तो काशी में मरना चाहेंगे, क्यों भाइयो?’’

‘‘ हाॅं शास्त्रों में कहा गया है कि काशी में मरने से सीधे स्वर्ग मिलता है,’’ भीड़ में से कुछ लोग बोले।

यह सुन कर अनेक श्रोता खड़े होकर काशी में मरने वालों के समर्थन में चिल्लाने लगे और सभा अस्तव्यस्त हो गई। 

नेता जी और उनके साथी अपने प्रयास को असफल मान आपस में कह रहे थे ,

‘‘ जरूर यह हमारे विरोधी गुट की चालाकी है।’’ 


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