Friday, September 18, 2020

138 कष्ट

 ‘‘ देखो तो, बड़े नोटों के बंद हो जाने से मजदूरों और गरीबों को कितना कष्ट हो रहा है, बेचारे दिन दिन भर लाइन में लगे रहने के कारण मजदूरी भी नहीं कर पाते और बेंक से पैसा भी नहीं निकल पाता। दूर से आने वाले तो रात में बेंक के गेट पर ही सो जाते हैं ताकि अगले दिन लाइन में वे आगे रह कर अपना पैसा पा सकें।’’ 

‘‘ हाॅं, ये लोग तो कष्टों को सहने के आदी होते हैं, जब पैसा हाथ में होता है तो भी कष्ट में रहते हैं और जब नहीं होता तब भी।’’

‘‘ अजीब बात है! तुम्हें इनके प्रति लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं है?’’ 

‘‘ अरे! उनके कष्ट का तो अनुभव करो जो गरीबों और गरीबी के कष्टों पर भाषण देकर सरकार को हर जगह कटघरे में खड़ा करते रहते हैं?’’

‘‘ क्या मतलब?’’

‘‘ जिनके घरों के कमरों, अलमारियों, बाक्सों इतना तक कि गद्दे और तकियों में ये बड़े बड़े नोट चुनावों के लिये संग्रह कर रखे हुए थे, उन्हें तो अब रद्दी में भी नहीं बेचा जा सकता। मैं उनके कष्टों की बात कर रहा था।’’


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