नगर सेठ पूजा करने के बाद मंदिर की सीढ़ियाॅं उतरते हुए गुनगुनाते आ रहे थे,
‘‘ तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा ’’
नीचे बैठे याचक आशा भरी निगाहों से उन्हें देखने लगे।
स्तुति गाते सेठ जी , हाथ में लिये चने और चिरोंजी दानों के मिश्रण वाले कागज के पेकेट में से थोड़े थोड़े से निकालते, उन्हें प्रसाद के रूप में बाॅंटते हुए चले जा रहे थे कि अपनी कार तक पहुंचने से पहले ही पेकेट की सामग्री समाप्त हो गई।
शेष रह गये याचक लोग आशान्वित थे कि शायद दूसरा पेकेट निकालेंगे, परंतु सेठ जी, ‘‘कहत शिवानन्द स्वामी वाॅंछित फल पावे’’ गुनगुनाते हुए कार में बैठ कर फुर्र हो गये ।
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