‘‘ गुरुदेव! परसों, अनेक वर्ष बाद आपके परम शिष्य धर्मदास से मुलाकात हुई। उसके पास आपकी कृपा से सब कुछ है लेकिन कुशल क्षेम के वार्तालाप में ही अनेक बार उसने यह कहा कि बिना आग के जल रहा हॅूं। मैं इसका अर्थ ही नहीं समझ सका, उसे सांत्वना भी नहीं दे सका, यह कितना दुखद है !’’
‘‘ क्या वह अपने स्तर से निम्न स्तर के व्यक्तियों के आधीन कार्य करता है ?’’
‘‘ नहीं गुरुदेव’’
‘‘ तो क्या उसके आस पास दुष्ट लोग निवास करते हैं ?’’
‘‘ नहीं गुरुदेव ’’
‘‘ इसका मतलब है, वह अवश्य ही अस्वास्थ्यकारक भोजन करता होगा ’’
‘‘ नहीं, बिलकुल नहीं गुरुदेव ’’
‘‘ तो हो सकता है उसका पुत्र बिलकुल मूर्ख हो ’’
‘‘ नहीं गुरुदेव ! वह तो अच्छी सरकारी नौकरी करता है’’
‘‘ यह नहीं है तो अवश्य उसकी पत्नी क्रोध मुखी होगी ’’
‘‘ क्या कहते हैं गुरुदेव, वह तो देवियों की तरह सुंदर हैं’’
‘‘ जब इन पाॅंच कारणों में से कोई नहीं है तो छठवां और अन्तिम कारण यही बचता है कि उसकी युवा कन्या विधवा हो गई हो, अन्य कुछ नहीं है जो बिना अग्नि के उसका शरीर जला सके ।’’
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