‘‘ आपने मुझे पाला, पढ़ा लिखा कर योग्य बनाया, तो यह तो आपका कर्तव्य था। अब आप हमसे यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि हम इस कारण आपके आदेशों के गुलाम बने रहेंगे?’’ रवि अपने चाचा से कहते हुए उठ खड़ा हुआ।
‘‘ यह बात नहीं है बेटा! तुम्हारी भलाई के लिए ही हम अपने अनुभव की बात करते हैं, तुम्हारे पिता होते तो क्या उनसे भी यही कहते?’’
‘‘ क्यों नहीं ? मेरी अपनी सोच है, अपनी मान्यताएं हैं, उनमें कोई बाधा डाले यह मैं नहीं चाहता।’’ कहते हुए रवि बाहर चला गया।
पास में बैठे रवि के चाचा के मित्र बोले,
‘‘ मलय! तेरा पुत्र और पुत्री भी इसी प्रकार अपने अड़ियलपन से विदेश जाकर वहीं बस गए। अब ये भतीजा भी बगावत पर उतर आया है, इसने तो मेरा भी लिहाज नहीं किया! धिक्कार है ऐसी संतान पर! ’’
‘‘ शायद, अपनों का सुख इसे ही कहते हैं! ’’ मलय ने क्षोभ में धीरे से कहा ।
‘‘ अरे ! जिससे अन्य लोग शेर की तरह डरते हों उसे अपने ही घर में क्या हो जाता है ?’’
‘‘ अब क्या.. बताएं नरेश !’’
‘‘क्या मतलबं?’’
‘‘ मेरी स्थिति भी अपने देश की तरह हो गई है, वह ‘चीन’ और ‘पाकिस्तान’ कीे बमबारी से एक साथ जूझ सकता है पर अपने ही घर के पत्थरबाजों के सामने पंगु हो जाता है, मूक हो जाता है।’’
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