‘‘ अरे ठाकुर! घर में ही घुसे रहते हो, रिटायर होने के बाद, एक बार भी नहीं दिखे , क्या बात है ?’’
‘‘ अरे, आओ पंडितजी! क्या बताएं सभी दुर्भाग्य है ।’’
‘‘ भाग्य को दोष देते हो ठाकुर! वह तो अपने ही पिछले संस्कारों का क्षयकाल होता है। ’’
‘‘ पता नहीं क्या सच है, मित्रों, रिश्तेदारों से मिलने में अपार ग्लानी होती है, देशविदेश में जाकर खूब इलाज कराया, पानी की तरह पैसा बहाया लेकिन मर्ज घटने के स्थान पर बढ़ता ही जा रहा है। ये देखो .. .. ’’
‘‘ अच्छा! तो यह बात है, ये तो सचमुच घातक चर्मरोग है। कोई बात नहीं जब संस्कार उदय हुआ है तो उसका अन्त भी होगा, हमें अपने प्रयास जारी रखना चाहिए।’’
‘‘ शायद मरने के बाद ही संभव हो ।’’
‘‘ लेकिन, आपने देशी जड़ीबूटी का उपयोग करके देखा कि नहीं ?’’
‘‘ अरे महाराज! सब प्रकार से थक चुका हॅूं ।’’
‘‘ अच्छा, वो जो हलके पीले फूलोंवाला छोटासा पौधा वहाॅं घूरे पर लगा है उसकी जड़, पत्ते, तना, फल, फूल सबको पीसकर लगा कर देखो।’’
‘‘ अरे पंडितजी! क्यों हंसी उड़ाते हो, चलो यह भी कर लेते हैं। ए धन्ना ! जा वह पौधा उखाड़ ला जो घूरे पर लगा है।’’
‘‘ ऐसे नहीं ठाकुर साब ! गहराई से खोदना पड़ेगा उसकी जड़ें बहुत मजबूत और गहरी होती हैं। इस रोग की यही दवा है।’’
‘‘ हः हः हः हः .... ’’
‘‘हॅस रहे हो! कोई भी अक्षर ऐसा नहीं जो मंत्र न हो, कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं जो औाषधि न हो और कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें योग्यता न हो, कमी रहती है तो केवल परख करने वाले की। जैसा बताया है वैसे लगाओ कुछ माह में इस कष्ट से मुक्त हो जाओगे।’’
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