Sunday, September 20, 2020

149 कचरा रिसर्च का

 रोज की तरह अनुत्साहित दिनेश आज जब अपनी लेब में पहॅंुचा तो टेबिल पर रखे लिफाफे को देख उसे डरते डरते खोला। पत्र पढ़ते ही उसकी खुशी का ठिकाना न रहा जब उसने पढ़ा ‘‘ योर पेपर एन्टाइटिल्ड.. .. .. हेज बीन एस्सेप्टेड फार पब्लिकेशन इन दिस जरनल एन्ड द जूरी हेज डिसाइडेड टू एवार्ड इट ए सर्टीफिकेट आफ मेरिट इन फोर्थकमिंग एनुअल मीट आफ द सोसाइटी’’। तत्काल उसका मन छः माह पहले हुए उस वार्तालाप पर जा टिका जब इसी पेपर के संबंध में सबसे पहले उसने अपने रिसर्च गाईड से चर्चा की थी।

‘‘ सर, वो अकेशिया वाले सेम्पिल में ‘इलेक्ट्रोल्यूम्नीसेंस’ के ट्रेसेज दिखाई दिये हैं, उसमें  इलेक्ट्रोड्स वेरिएशन करने पर प्रोमिसिंग रिजल्ट्स आये हैं। मैंने उनको एक्सप्लेन करने का प्रयास किया है, जरा देख लीजिए’’

‘‘ और, मैंने जो कहा था कि ‘पीआईपी’ का टेस्ट करना, तो, आठ माह से कोई रिजल्ट्स नहीं मिले? मैं जिस पैटर्न पर काम करा रहा हॅू उससे हटकर तुम क्या प्रदर्शित करना चाहते हो? आइंसटीन कहलाना चाहते हो?’’

‘‘  नहीं सर, ‘पीआईपी’ को भी पूरा कर चुका हॅूं केवल लिखना रह गया है। ‘इएल’ में एंकरेजिंग रिजल्ट्स जानकर उसे पहले लिख लिया। आप देख लीजिए, यदि सहमत हों तो किसी अच्छे जरनल में प्रकाशन के लिए भेज देते हैं।’’ 

‘‘ अच्छा, हाॅं, तो ये है तुम्हारा काम? सब रबिश है, किसने कह दिया कि ये एंकरेजिंग  रिजल्ट्स है? अरे ये रिजल्ट्स तो ‘नाइट्रोजनस डिस्चार्ज’ में पाए जाते हैं, तुम इन्हें.. .. ?’’ 

.. कहते हुए पेपर्स दूर फेककर रिसर्च गाइड नाराज होकर चले गए थे, वह दृश्य फिर सामने था और, उसी तरह आंसू भी जब मित्र की सलाह पर कोआथर में गाइड का नाम देकर उसने वह पेपर देश के ही प्रसिद्ध जरनल में भेज दिया था कि सचमुच कचरा ही होगा तो वापस आ जाएगा। इस मनःस्थिति में डूबा दिनेश सोच रहा था कि काश! गाइड महोदय ने नकारात्मक रुख न अपनाया होता... ... इसी बीच गाइड महोदय भी उसी प्रकार का लिफाफा लिए दिनेश की लेब में आए और बोले,

‘‘अरे दिनेश! यह कौन सा पेपर था, तुमने बताया ही नहीं, ये तो अमेरिका के जरनल में प्रकाशित होने लायक था’’

‘‘ सर, यह वही .. .. ..’’


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