Sunday, September 20, 2020

144 कोई आपत्ति नहीं

 समाजविरोधी गतिविधियों में लगे एक धनी व्यापारी का युवा मित्र महात्मा बुद्ध के किसी विशेष प्रवचन से प्रभावित होकर उनका शिष्य हो गया। अपने परम मित्र को, बुद्ध का शिष्य हो जाने से इस धनी व्यापारी को अकेलेपन का बड़ा दुख होने लगा क्योंकि अब उसके कार्यों में साथ देने वाला कोई नहीं था। जब यह व्यापारी अपने आप पर नियंत्रण न कर पाया तो वह वहाॅं पहुंचा जहाॅं पर बुद्ध अपना प्रवचन दे रहे थे। उन्हें देखकर वह बहुत ही निन्दनीय भाषा में अपशब्दों का प्रयोग कर बुद्ध का अपमान करने लगा। बुद्ध ने कुछ नहीं कहा केवल मुस्काते रहे। अन्त में व्यापारी थककर बोला, 

‘‘ मैं ने तुम्हें इतना भला बुरा कहा लेकिन तुम्हारी ओर से थोड़ी सी भी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली, थोड़ी सी भी नाराजी दिखाते या विरोध करते तो मैं सन्तुष्ठ हो जाता?’’

बुद्ध दबी हुई हंसी लिये बोले, ‘‘ मानलो तुम किसी को एक लाख रुपये देते हो और वह स्वीकार कर लेता है तो वह रुपये किसके कहलाएंगे?’’

‘‘ ये भी कोई पूछने की बात है, उसी के हो जाएंगे जिसे मैं ने दिये हैं,’’ धनी व्यापारी बोला।  

‘‘ अच्छा, अब मानलो वह व्यक्ति तुम्हारे द्वारा दिया गया रुपया लेना अस्वीकार कर देता है तो वह धन कहाॅं जाएगा?’’ बुद्ध ने फिर से पूछा।

‘‘ अरे! इतना भी नहीं जानते, जब वह नहीं लेगा तो मेरे पास ही मेरा धन रहेगा, और कहाॅं जाएगा?’’ व्यापारी ने तत्क्षण जबाब दिया।

‘‘ इसी प्रकार, जब तुम मुझे अपनी गन्दगी भेंट कर रहे थे, मुझे उसे स्वीकारने की कोई इच्छा नहीं थी। तुम उसे अपने पास ही रखे रह सकते हो।’’ बुद्ध मुस्काते हुए बोले।

‘‘ लेकिन, मैं इतनी अधिक निन्दित गन्दगी का क्या करूंगा’’ वह व्यक्ति बोला।

‘‘ भाई! यह तो तुम ही जानो, चाहे उसे आभूषणों की तरह पहने रहो या जैसे तुम चाहो वह करोे, मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है’’ बुद्ध ने जबाब दिया।


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