‘‘ अच्छा, युधिष्ठिर ! ये बताओ कि संसार में सुखी कौन है? ’’ यक्ष ने पूछा ।
वे बोले ‘‘ दिवसस्याष्टमे भागे शाकम पचति यो नरः, अनृणी अप्रवासी च स वारिचारः मोदते।’’
अर्थात् ‘ वह व्यक्ति जो एक दिन में कम से कम एक बार भोजन पा जाता है, जिसे किसी का कोई कर्ज नहीं देना है, और जिसे आजीविका के लिये अपना घरबार छोड़कर दूसरे स्थान पर नहीं रहना पड़ता है, वास्तव में वही सुखी है।’
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