Thursday, September 24, 2020

167 न्याय, यमराज का

 ‘‘ अच्छा! तो तुमने अपने पिछले जन्मों के लेखेजोखे की फिल्म देख ली?’’ यमराज ने अनेक वर्ष पहले मृत हुए व्यक्ति की भटकती जीवात्मा को पुनः देह पाने का क्रम आने पर पूछा।

‘‘ देख ली प्रभु! ’’

‘‘ तो स्वयं निर्णय करो कि उन जन्मों के संचित संस्कारों को भोगने के लिए तुम्हें किस जीवधारी का शरीर दिया जाना उचित होगा’’  यमराज बोले।

‘‘ उनके अनुसार तो कुत्ते का शरीर ही मिल सकता है।’’

‘‘ तो ठीक है कुत्तों के लिए अभी धरती पर बहुत स्थान खाली है, जा सकते हो’’ यमराज ने आदेश दिया।

‘‘परन्तु प्रभो! मुझे कम से कम एक बार और मनुष्य का शरीर दे दो, वचन देता हॅूं कि मैं परिमार्जन कर अपना लक्ष्य पाने की चेष्टा करूंगा’’  जीवात्मा ने गिड़गिड़ाकर कहा।

‘‘अच्छा ! तो थोड़ा सा इस फिल्म को भी देखो’’ यमराज ने घूरते हुए इशारा किया।

‘‘ अरे! यह लोग भी मेरी तरह मनुष्य का शरीर पाने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं।’’

‘‘हाॅं, अब मनुष्य देह पाने के बाद इनको देखो।’’

‘‘ अरे! यह लोग तो बड़े ही सम्मानित स्तर पर दिखाई देते हैं, लाखों लोग इन्हें घेरे रहते हैं, उन्हें देवता मानकर पूजते हैं और अनुसरण भी करते हैं, वाह!’’

‘‘ और अब यह दृश्य भी देखो ।’’

‘‘ ओह! भीतर कुछ और, बाहर कुछ और। कितने निकृष्ट हैं ये, कहते कुछ हैं करते कुछ हैं। ये तो जिसका खाते हैं उसी के पेट पर लात मारकर चल देते हैं। इससे अच्छे तो कुत्ते हैं कम से कम टुकड़े का मान तो रखते हैं !’’

‘‘ तो समझे, मैंने यदि तुम्हारे गिड़गिड़ाने पर दया दिखाई तो यही तुम्हारा हाल होगा।’’

‘‘ नहीं प्रभो! मैं वचन देता हॅूं अपनी मानव देह का आत्मोत्थान में ही सदुपयोग करूंगा’’

‘‘ नहीं ! मैं अब मनुष्य जाति को और अधिक कलंकित नहीं होने दे सकता’’ यमराज ने दृढ़ता पूर्वक कहा।


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