‘‘पापा! वह नदी के किनारे रेत में कौन है?’’
‘‘मगरमच्छ’’
‘’ वह क्या पानी में रहता है?’’
‘‘ नहीं, परन्तु पानी में बड़ी बड़ी मछलियों का शिकार करने जाता है, फिर बाहर आकर रेत पर आराम करता है।’’
‘‘ लेकिन उसे देखकर लगता है कि वह जीवित नहीं है, देखो वह मुंह फैलाए है और छोटे छोटे पक्षी उसमें घुसकर दांतों पर चोंच मारते हैं और कुछ दूर बैठे देख रहे हैं, पर वह किसी को कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाता ?’’
‘‘ वह जीवित है, वे पक्षी उसके दांतो में फंसे मांस के टुकड़े खाते रहते हैं, जो दूर बैठे हैं वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं?’’
‘‘ इस प्रकार तो वह पक्षियों का बहुत हितैषी हुआ, वह भोजन देकर उनकी सेवा करता है।’’
‘‘ यह सेवा नहीं लेन.देन कहलाता है, सेवा में तो केवल देना होता है बदले में लेने की कोई अपेक्षा नहीं होती।’’
‘‘ कैसे?’’
‘‘ मगरमच्छ इसलिए मुंह फैलाए रहता हैं क्योंकि वह अपने दांतों की सफाई कराना चाहता है और पक्षी दांतों के बीच फसे मांस के टुकड़े खाने के बदले यह काम कर देते हैं, यह लेनदेन हुआ कि नहीं।’’
‘‘ हमारे देश के नेता लोग कहते हैं कि वह देश की बहुत सेवा करते हैं?’’
‘‘ वह भी मगरमच्छ की तरह जनता के धन की बड़ी बड़ी योजनाओं के सागर में अपनी पसंद की बड़ी बड़ी मछलियों का शिकार करते हैं और दांतों की साफ सफाई कराने के लिए सरकारी तन्त्र के साथ अपने चमचों को लगाये रहते हैं, बेचारी जनता आस लगाए दूर से ही सब देखती रहती है।’’
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